छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी?
राज्य गठन के 25 साल बाद भी भाषा नीति पर सवाल, 500 से अधिक छात्र बेरोजगार; जानें कारण और संभावित समाधान

रायपुर: छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी? छत्तीसगढ़ राज्य के गठन को 25 साल पूरे होने वाले हैं, और इन ढाई दशकों में राज्य सरकार ने अपनी आंचलिक पहचान और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा को प्रोत्साहित करने के बड़े-बड़े दावे किए हैं। स्कूलों में छत्तीसगढ़ी पढ़ाई जाने लगी, विश्वविद्यालयों में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू किए गए, ताकि इस समृद्ध भाषा को उसका उचित स्थान मिल सके। लेकिन इन दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक कड़वा सच छुपा है – पिछले 12 सालों में 500 से अधिक छात्र-छात्राओं ने छत्तीसगढ़ी भाषा में एमए की डिग्री हासिल की, बावजूद इसके किसी को भी सरकारी नौकरी नहीं मिली है। यह आंकड़ा न केवल राज्य की भाषा नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि उन युवाओं के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जिन्होंने अपनी ही भाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का सपना देखा था।
वादे बड़े, रोजगार शून्य: एक विडंबनापूर्ण स्थिति
जब 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, तब से ही यह प्रबल मांग उठती रही है कि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया जाए और सरकारी नौकरियों में इसे महत्व मिले। इस मांग को आंशिक रूप से पूरा करते हुए, 2013 में छत्तीसगढ़ी को स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया गया और राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में एमए इन छत्तीसगढ़ी जैसे पाठ्यक्रम शुरू किए गए। वर्तमान में, राज्य के पांच सरकारी और निजी विश्वविद्यालय यह डिग्री प्रदान कर रहे हैं। हर साल औसतन 40-50 छात्र इन पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते हैं, इस उम्मीद के साथ कि अपनी मातृभाषा में शिक्षा उन्हें रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान करेगी।छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी?
लेकिन वास्तविकता इन उम्मीदों से कोसों दूर है। इन 500 से अधिक एमए डिग्रीधारकों में से किसी को भी सरकारी क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल पाया है। यह स्थिति उन छात्रों के लिए हताशा का कारण बन रही है, जिन्होंने अपनी पहचान से जुड़ी भाषा के प्रति लगाव और भविष्य में करियर बनाने की आकांक्षा के साथ इस पाठ्यक्रम को चुना था।छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी?
राजनेताओं के अधूरे वादे: उम्मीदों पर फिरा पानी
यह समस्या केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अपने कार्यकाल के दौरान छत्तीसगढ़ी में एमए करने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। इसी तरह, सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने जब शिक्षा मंत्री का पद संभाला था, तब उन्होंने भी ऐसे ही वादे किए थे। दुखद यह है कि ये घोषणाएं केवल चुनावी वादे बनकर रह गईं और उन पर कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बन पाई। इन अधूरे वादों ने न केवल छात्रों में निराशा बढ़ाई है, बल्कि राज्य के राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी?
समस्या की जड़: नीतिगत उदासीनता और दूरदर्शिता की कमी
इस गंभीर समस्या की जड़ में स्पष्ट रूप से नीतिगत उदासीनता और दूरदर्शिता की कमी दिखाई देती है। जब किसी भाषा में उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम शुरू किए जाते हैं, तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उन डिग्रीधारकों के लिए रोजगार के अवसर भी सृजित करे। छत्तीसगढ़ी में एमए करने वाले छात्रों के लिए मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में अवसर हो सकते हैं:
शिक्षण: स्कूलों और कॉलेजों में छत्तीसगढ़ी भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति।
सरकारी प्रशासन: राजभाषा विभाग में विशेषज्ञ, अनुवादक, या अन्य प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति जहां छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान आवश्यक हो।
दुर्भाग्य से, इन दोनों ही क्षेत्रों में पर्याप्त अवसर सृजित नहीं किए गए हैं। स्कूलों में छत्तीसगढ़ी पढ़ाने वाले शिक्षकों की भर्ती के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है, और राजभाषा विभाग में भी सीमित पद हैं। इसके अतिरिक्त, अन्य सरकारी विभागों में छत्तीसगढ़ी भाषा के ज्ञान को प्राथमिकता देने वाली कोई स्पष्ट नीति नहीं है।छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी?
समाधान की ओर: क्या हो सकती है राह?
इस विकट समस्या का समाधान करने के लिए राज्य सरकार को तत्काल और ठोस कदम उठाने होंगे। इसमें शामिल हो सकते हैं:
नीतिगत समीक्षा और क्रियान्वयन: छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा के रूप में पूरी तरह से लागू करने और इसके लिए एक स्पष्ट और प्रभावी राजभाषा नीति बनाने की आवश्यकता है। इसमें छत्तीसगढ़ी में एमए करने वालों के लिए विशेष पदों का सृजन शामिल होना चाहिए।
शिक्षक भर्ती में प्राथमिकता: स्कूलों में छत्तीसगढ़ी भाषा की पढ़ाई को अनिवार्य किया जाए और छत्तीसगढ़ी में एमए करने वाले छात्रों को शिक्षक भर्ती में प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए अलग से शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) या विशेष भर्ती अभियान चलाया जा सकता है।
राजभाषा विभाग का सशक्तिकरण: राजभाषा विभाग को मजबूत किया जाए और वहां छत्तीसगढ़ी भाषा विशेषज्ञों, अनुवादकों और शोधकर्ताओं के लिए पर्याप्त पदों का सृजन किया जाए।
पाठ्यक्रम का पुनर्गठन: एमए छत्तीसगढ़ी के पाठ्यक्रम को केवल साहित्यिक अध्ययन तक सीमित न रखकर, इसे पत्रकारिता, जनसंपर्क, अनुवाद और भाषा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों से भी जोड़ा जाए, ताकि छात्रों को निजी क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर मिल सकें।
उद्यमिता को बढ़ावा: छत्तीसगढ़ी भाषा में सामग्री निर्माण, डिजिटल मीडिया, पॉडकास्टिंग और वेब सीरीज जैसे क्षेत्रों में युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी सहायता और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
छत्तीसगढ़ी भाषा राज्य की पहचान है, और इसे बढ़ावा देना हर सरकार का कर्तव्य है। लेकिन यह बढ़ावा तभी सार्थक होगा जब भाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं को सम्मानजनक रोजगार भी मिल सके। अन्यथा, यह केवल “भाषा को सम्मान मिला, लेकिन नौकरी का हक नहीं” वाली विडंबनापूर्ण स्थिति बनी रहेगी, जो राज्य के विकास और युवा शक्ति के लिए एक बड़ा नुकसान होगा। सरकार को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने होंगे, ताकि छत्तीसगढ़ी भाषा का भविष्य उज्ज्वल हो और उसके अध्येताओं को भी सम्मानजनक जीवन मिल सके।छत्तीसगढ़ी भाषा को मिला सम्मान, पर एमए डिग्रीधारकों को क्यों नहीं मिल रही नौकरी?



















