छत्तीसगढ़ियों के साथ षड्यंत्र: छत्तीसगढ़ीभाषी राज्य का दर्जा नहीं मिला – नंदकिशोर शुक्ल

रायपुर: रविवार को राजधानी में छत्तीसगढ़ीभासी राज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में प्रमुख साहित्यकार, संस्कृति विशेषज्ञ, रंगकर्मी, पत्रकार, शिक्षक, लोक कलाकार, कर्मचारी नेता, छात्र, और संगठन सेनानी शामिल हुए। इस वर्ष का विषय था ‘छत्तीसगढ़ी भासी राज का दर्जा’, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के संरक्षक नंदकिशोर शुक्ल ने संबोधित किया।
शुक्ल ने बताया कि राज्य निर्माण के बाद से ही छत्तीसगढ़ियों के साथ एक बड़ा षड्यंत्र हुआ है। 2001 से 2003 तक राज्य और केंद्र सरकार के बीच छत्तीसगढ़ की श्रेणी को लेकर कई पत्राचार हुए। केंद्र से पूछे जाने पर कि छत्तीसगढ़ को किस श्रेणी में रखा जाए, तो षड्यंत्र के तहत इसे हिंदीभाषी राज्यों की ‘क’ श्रेणी में डाल दिया गया, जबकि इसे ‘ख’ श्रेणी में होना चाहिए था, जो छत्तीसगढ़ी और हिंदीभाषी राज्यों के लिए है।
इस षड्यंत्र के कारण छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर संघर्ष आज भी जारी है। 2007 में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया गया, लेकिन इसे द्वितीय भाषा के रूप में रखा गया। इसी प्रकार, 2008 में ‘छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग’ का गठन किया गया, लेकिन बाद में इसे भी ‘छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’ कर दिया गया।
2020 में नवा शिक्षा नीति के तहत हुए सर्वेक्षण में यह सामने आया कि 65% से अधिक लोगों की मातृभाषा छत्तीसगढ़ी है, जबकि केवल 5% लोग हिंदी बोलते हैं। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ी को सरकारी कामकाज और शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया गया। सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि जल्द ही राज्य के मंत्रियों और मुख्यमंत्री से मुलाकात कर इस विषय पर बात की जाएगी और छत्तीसगढ़ को छत्तीसगढ़ी-भाषी राज्य का दर्जा दिलाने की मांग की जाएगी।
सम्मेलन में शामिल प्रमुख लोग: वरिष्ठ पत्रकार रामअवतार तिवारी, बृजेश चौबे, प्रकाश शर्मा, विधि विशेषज्ञ राजीव तिवारी, प्रोफेसर डॉ. तपेशचंद्र गुप्ता, डॉ. प्रीति सतपथी, रंगकर्मी विजय मिश्रा, कर्मचारी नेता सीएल दुबे।



















