मरवाही वन विभाग में ‘फर्जीवाड़ा’ का बोलबाला: क्या फाइलों में दफन हो गया न्याय? डीएफओ की चुप्पी पर उठे सवाल!

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही: छत्तीसगढ़ के जंगलों की रक्षा करने वाला विभाग खुद भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े के घेरे में है। मरवाही वनमंडल में फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। आरोप है कि यहाँ कानून का पालन करने वाले ही अब उसकी ‘हत्या’ पर उतारू हैं।
प्रशासन के आदेश की अनदेखी: आखिर किसकी शह पर?
मरवाही वन विभाग में ‘फर्जीवाड़ा’ का बोलबाला: यह पूरा मामला तब गरमाया जब लिखित शिकायत के बाद जिला कलेक्टर ने मामले की गंभीरता को समझा और जांच की अनुमति दी। इसके बाद डिप्टी कलेक्टर की ओर से स्पष्ट जांच आदेश भी जारी किए गए। लेकिन, सवाल यह उठता है कि आखिर मरवाही वनमंडल अधिकारी (DFO) ने इन आदेशों को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया?
मरवाही वन विभाग में ‘फर्जीवाड़ा’ का बोलबाला: आरोप लग रहे हैं कि जांच की प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाया गया है। दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन करने के बजाय, पूरे मामले को कागजी लीपापोती तक सीमित कर दिया गया। क्या यह सिस्टम की विफलता है या भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें?
कुर्सी पर जमे ‘फर्जी’ कर्मचारी, सिस्टम पर भारी भ्रष्टाचार
मरवाही वन विभाग में ‘फर्जीवाड़ा’ का बोलबाला: सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन कर्मचारियों पर फर्जी डिग्री और दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल करने का गंभीर आरोप है, वे न केवल अपनी कुर्सी पर सुरक्षित बैठे हैं, बल्कि सरकारी खजाने से वेतन भी उठा रहे हैं। यह स्थिति उन ईमानदार युवाओं के साथ क्रूर मजाक है जो दिन-रात मेहनत कर नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं।
जांच में हुई लापरवाही के तीन बड़े संकेत:
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आदेश के बावजूद जांच प्रक्रिया शुरू न होना।
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आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न होना।
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उच्चाधिकारियों के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना।
अब जनता की मांग: कब होगी कड़ी कार्रवाई?
मरवाही वन विभाग में ‘फर्जीवाड़ा’ का बोलबाला: इस मामले के तूल पकड़ने के बाद अब पूरे जिले में विरोध के सुर तेज हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने प्रशासन से निम्नलिखित सख्त कदम उठाने की मांग की है:
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तत्काल FIR: फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी हथियाने वाले कर्मचारियों पर तुरंत मुकदमा दर्ज हो।
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DFO का निलंबन: जांच आदेश की जानबूझकर अवहेलना करने के आरोप में मरवाही वनमंडल अधिकारी को पद से हटाया जाए।
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स्वतंत्र जांच: पूरे घोटाले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
साख की परीक्षा में प्रशासन
मरवाही वन विभाग में ‘फर्जीवाड़ा’ का बोलबाला: यदि जिला प्रशासन अब भी मौन रहता है, तो यह संदेश जाएगा कि प्रशासनिक आदेशों की कोई कीमत नहीं है और फर्जीवाड़ा करने वाले लोग व्यवस्था से अधिक शक्तिशाली हैं। यह केवल एक विभागीय जांच नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ प्रशासन की साख और ‘कानून के राज’ की कड़ी परीक्षा है। अब देखना यह है कि दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाता है या यह खेल यूं ही चलता रहेगा।








![शिक्षा सत्र का डेढ़ माह बीता, अब तक स्कूलों में नहीं पहुंचीं किताबें, पुरानी पुस्तकों के सहारे भविष्य की पढ़ाई गौरेला-पेंड्रा-मरवाही: छत्तीसगढ़ में नया शैक्षणिक सत्र 2025-26 शुरू हुए डेढ़ महीने से अधिक का समय हो गया है, लेकिन गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले के सरकारी स्कूलों में छात्रों के बस्ते अब भी खाली हैं।[1] पाठ्य पुस्तक निगम की लापरवाही के चलते अधिकांश कक्षाओं की किताबें अब तक स्कूलों तक नहीं पहुंच पाई हैं।[1][2] इस स्थिति के कारण छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है और वे पुरानी किताबों से काम चलाने को मजबूर हैं।[1] त्रैमासिक परीक्षा सिर पर, कैसे पूरा होगा कोर्स? स्कूलों में किताबों की यह कमी शिक्षकों और अभिभावकों दोनों के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गई है। लगभग डेढ़ महीने बाद त्रैमासिक परीक्षाएं होनी हैं, ऐसे में बिना नई किताबों के पाठ्यक्रम को समय पर पूरा करना एक बड़ी चुनौती है।[1] जिले के प्राइमरी से लेकर मिडिल स्कूलों तक में यही स्थिति है। उदाहरण के लिए, कक्षा 6वीं के छात्रों को सिर्फ गणित की किताब मिली है, जबकि 8वीं के छात्रों को भी कुछ ही विषयों की पुस्तकें प्राप्त हुई हैं।[1] नए पाठ्यक्रम के कारण पुरानी किताबों से पढ़ाई करना भी पूरी तरह संभव नहीं हो पा रहा है।[1] क्यों हुई किताबों के वितरण में देरी? इस साल किताबों के वितरण में देरी के कई कारण सामने आ रहे हैं: तकनीकी खामियां: इस वर्ष भ्रष्टाचार रोकने के लिए किताबों पर बारकोड लगाए गए हैं।[3][4] लेकिन पाठ्य पुस्तक निगम के पोर्टल का सर्वर बार-बार डाउन होने से स्कूलों में किताबों की स्कैनिंग और डेटा अपलोडिंग का काम अटक गया है, जिससे वितरण रुका हुआ है।[5][6] पुराने डेटा पर छपाई: किताबों की छपाई पुराने यू-डायस (UDISE) डेटा और पिछले साल के स्टॉक के आधार पर की गई। इसमें नए दाखिलों और छात्रों की बढ़ी हुई संख्या का अनुमान नहीं लगाया गया, जिससे कई स्कूलों में मांग के अनुरूप किताबें नहीं पहुंचीं।[1][2] वितरण में अव्यवस्था: पाठ्य पुस्तक निगम से स्कूलों तक किताबें पहुंचाने की प्रक्रिया में भी अव्यवस्था देखने को मिली है।[2][5] प्रशासन के दावों के बावजूद स्थिति जस की तस हालांकि, पाठ्य पुस्तक निगम और शिक्षा विभाग के अधिकारी जल्द ही किताबें पहुंचाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।[2][5] स्कूल प्रबंधन द्वारा जिला कार्यालय को किताबों की मांग के लिए पत्र लिखे जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।[1] इस लापरवाही का खामियाजा सीधे तौर पर प्राइमरी और मिडिल स्कूल के मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। अभिभावकों और शिक्षकों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द किताबों की व्यवस्था की जाए ताकि छात्रों की पढ़ाई और भविष्य अधर में न लटके।[1]](https://nidarchhattisgarh.com/wp-content/uploads/2025/08/16a.jpg)
