20 साल बाद मिला इंसाफ: मौत के बाद रिश्वत के आरोप से बरी हुए पूर्व मैनेजर, हाईकोर्ट ने कानून पर कही बड़ी बात

बिलासपुर: 20 साल बाद मिला इंसाफ: मौत के बाद रिश्वत के आरोप से बरी हुए पूर्व मैनेजर, हाईकोर्ट ने कानून पर कही बड़ी बात, न्याय मिलने में देरी भले ही हुई, लेकिन अंततः सच की जीत हुई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो दशक पुराने एक कथित रिश्वत मामले में आरोपी को मरणोपरांत बाइज्जत बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने सीबीआई कोर्ट के पुराने फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल पैसों का मिलना ही अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
क्या है 2004 का यह पूरा विवाद?
20 साल बाद मिला इंसाफ:यह मामला साल 2004 का है, जब कोरिया कोलियरी (SECL) में तैनात तत्कालीन पर्सनल मैनेजर जितेंद्र नाथ मुखर्जी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। शिकायतकर्ता माइकल मसीह ने आरोप लगाया था कि उनके पीएफ (PF) खाते से 2.5 लाख रुपये की अग्रिम राशि निकलवाने के बदले में मैनेजर ने ₹5000 की रिश्वत मांगी थी।
20 साल बाद मिला इंसाफ:सीबीआई ने इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए 27 फरवरी 2004 को मुखर्जी के आवास पर जाल बिछाया और उन्हें कथित तौर पर पैसे लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
सीबीआई कोर्ट की सजा और लंबी कानूनी लड़ाई
साल 2006 में रायपुर की विशेष सीबीआई अदालत ने आरोपी को दोषी पाया और उन्हें एक साल के कारावास के साथ जुर्माने की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की। हालांकि, सुनवाई के लंबे दौर के बीच आरोपी की मृत्यु हो गई, लेकिन उनकी पत्नी ने हार नहीं मानी और अपने पति के सम्मान की रक्षा के लिए कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में इस लड़ाई को जारी रखा।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: “सिर्फ पैसे मिलना अपराध नहीं”
20 साल बाद मिला इंसाफ:बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले की गहन समीक्षा की और अभियोजन पक्ष की कहानी में कई गंभीर खामियां पाईं। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:
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रिश्वत की मांग का अभाव: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत धारा 7 और 13 के लिए ‘रिश्वत की मांग’ (Demand) और ‘स्वीकृति’ (Acceptance) दोनों का साबित होना अनिवार्य है। इस केस में मांग की पुष्टि केवल शिकायतकर्ता के बयानों पर आधारित थी, जिसका कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था।
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दस्तावेजों में गड़बड़ी: जिस पीएफ आवेदन को आधार बनाकर रिश्वत मांगने की बात कही गई थी, उसका मूल दस्तावेज कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। केवल फोटोकॉपी के आधार पर दोषसिद्धि को सही नहीं माना जा सकता।
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गवाहों के विरोधाभासी बयान: मामले के स्वतंत्र गवाहों ने केवल पैसे की बरामदगी की बात कही, लेकिन उन्होंने रिश्वत मांगने की पुष्टि नहीं की।
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बचाव पक्ष का तर्क: आरोपी ने पहले ही कहा था कि शिकायतकर्ता ने जबरदस्ती पैसे थमाने की कोशिश की थी, जिसे झटकने पर पैसे जमीन पर गिर गए थे। कोर्ट ने पाया कि परिस्थितियों को देखते हुए इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
ऐतिहासिक फैसला और बेगुनाही की मुहर
20 साल बाद मिला इंसाफ:सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन को अपना केस “संदेह से परे” साबित करना होता है। चूंकि इस मामले में ‘डिमांड’ साबित नहीं हो सकी, इसलिए केवल बरामदगी के आधार पर सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
20 साल बाद मिला इंसाफ:अदालत ने आरोपी जितेंद्र नाथ मुखर्जी को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए उनकी सजा रद्द कर दी। हालांकि आरोपी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन इस फैसले ने उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को कानूनी रूप से बहाल कर दिया है।
20 साल बाद मिला इंसाफ:यह लेख कानूनी सिद्धांतों और साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करता है, जो भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता का प्रमाण है।









