छत्तीसगढ़ नगरीय निकायों में ‘पति राज’ खत्म: अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि, NHRC के निर्देश पर सख्त आदेश जारी

छत्तीसगढ़ शासन ने नगरीय निकायों में महिला पार्षदों और जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों या रिश्तेदारों द्वारा कामकाज संभालने की परंपरा पर पूर्णतः रोक लगा दी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की सख्ती के बाद राज्य के नगरीय प्रशासन विभाग ने इस संबंध में कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
प्रतिनिधि राज पर लगाम: अब निर्वाचित सदस्य ही होंगे जवाबदेह
छत्तीसगढ़ के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में अब ‘प्रतिनिधि’ संस्कृति गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। अक्सर देखा जाता है कि महिला पार्षद या अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि केवल कागजों तक सीमित रहती हैं, जबकि उनके वास्तविक अधिकारों का प्रयोग उनके पति, भाई या अन्य रिश्तेदार करते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन मानते हुए इस पर संज्ञान लिया है।अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि
NHRC की आपत्ति और संवैधानिक उल्लंघन
आयोग को मिली शिकायतों के अनुसार, कई सांसद, विधायक और स्थानीय निकायों के निर्वाचित सदस्य अनौपचारिक रूप से अपने रिश्तेदारों को ‘संपर्क व्यक्ति’ या ‘प्रतिनिधि’ के रूप में नियुक्त कर लेते हैं। आयोग का मानना है कि यह प्रथा न केवल स्थानीय स्वशासन में अनुचित हस्तक्षेप है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3) और अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त अधिकारों का भी उल्लंघन है।अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि
इस मामले में आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यह महिलाओं के सम्मान और उनके स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार के विरुद्ध है।अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि
नगरीय प्रशासन विभाग का नया फरमान
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नोटिस के बाद छत्तीसगढ़ के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने सभी निगम आयुक्तों और मुख्य नगर पालिका अधिकारियों (CMO) को आदेश जारी किया है।अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि
आदेश की मुख्य बातें:
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सभी निकायों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के कामकाज का परीक्षण किया जाए।
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यदि कोई रिश्तेदार ‘प्रॉक्सी प्रतिनिधि’ या ‘लायजन पर्सन’ के रूप में काम कर रहा है, तो उसे तुरंत हटाया जाए।
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सांसदों और विधायकों को भी आयोग के इन निर्देशों से अवगत कराने के निर्देश दिए गए हैं ताकि वे अपने स्तर पर नियुक्तियों में पारदर्शिता बरतें।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: ‘सरपंच पति’ प्रथा असंवैधानिक
गौरतलब है कि करीब दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी एक अहम फैसले में कहा था कि महिला सरपंचों के अधिकारों का उनके पतियों द्वारा उपयोग करना पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक है। कोर्ट ने इसे महिला सशक्तिकरण की राह में बड़ी बाधा माना था। अब इसी तर्ज पर नगरीय निकायों में भी पार्षदों और अन्य जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों के हस्तक्षेप को रोकने की तैयारी है।अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि
निष्कर्ष: महिला सशक्तिकरण की ओर एक बड़ा कदम
इस फैसले से न केवल स्थानीय प्रशासन में पारदर्शिता आएगी, बल्कि उन महिला जनप्रतिनिधियों को वास्तव में आगे आने का मौका मिलेगा जो अब तक केवल ‘रबर स्टैंप’ बनी हुई थीं। शासन के इस सख्त रुख से जमीनी स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होगा और जनता की समस्याओं का सीधा समाधान निर्वाचित प्रतिनिधि के माध्यम से हो सकेगा।अब खुद काम संभालेंगी महिला जनप्रतिनिधि









