GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग: दो अधिकारियों के कारनामों से प्रशासन की साख दांव पर

GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिले गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) में इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। जिले के दो रसूखदार अधिकारियों—इंजीनियर अंकित जैन और उप अभियंता वीरेंद्र बलभद्रे—पर लगे गंभीर आरोपों ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने विवादों के बाद भी इन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? इन्हें किसका कवच प्राप्त है?
मरवाही में इंजीनियर अंकित जैन के खिलाफ सरपंचों का हल्लाबोल
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:ग्रामीण यांत्रिकी सेवा में पदस्थ इंजीनियर अंकित जैन वर्तमान में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के निशाने पर हैं। सरपंच संघ मरवाही ने उनके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए भ्रष्टाचार और अभद्रता के सनसनीखेज आरोप लगाए हैं।
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:सरपंचों का दावा है कि अंकित जैन न केवल विकास कार्यों के एवज में कमीशन की मांग करते हैं, बल्कि विरोध करने पर रसूख का डर भी दिखाते हैं। आरोपों के अनुसार, वे अक्सर कैबिनेट मंत्री का नाम लेकर जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाते हैं। इस कथित तानाशाही रवैये से आक्रोशित सरपंच संघ ने अब चेतावनी दी है कि यदि उन्हें जल्द पदमुक्त नहीं किया गया, तो जिले में उग्र आंदोलन और अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा।
वीरेंद्र बलभद्रे का मामला: जब मंत्रालय के आदेश भी हो गए ‘बेअसर’
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:दूसरा मामला उप अभियंता वीरेंद्र बलभद्रे से जुड़ा है, जो व्यवस्था को ठेंगा दिखाने का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। नियमों के मुताबिक किसी भी अधिकारी का एक ही स्थान पर लंबे समय तक रहना उचित नहीं माना जाता, लेकिन बलभद्रे साल 2013 से इसी क्षेत्र में जमे हुए हैं।
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:हैरानी की बात तो यह है कि साल 2024 में उनका स्थानांतरण आदेश जारी हुआ, जिसे उन्होंने दरकिनार कर दिया। इसके बाद 2025 में मंत्रालय स्तर से ‘एकपक्षीय कार्यमुक्ति’ (Relieving) के निर्देश आए, फिर भी वे अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। सरकारी आदेशों की ऐसी खुली अवहेलना जिला प्रशासन की मंशा पर गहरे सवाल उठाती है।
क्या रसूख और संरक्षण के आगे नतमस्तक है तंत्र?
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:स्थानीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि इन अधिकारियों को जिला स्तर पर बड़े पद का संरक्षण प्राप्त है। कलेक्टर कार्यालय की चुप्पी ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। जनता पूछ रही है कि क्या कोई अधिकारी शासन और मंत्रालय के आदेशों से भी ऊपर हो सकता है?
दो-दो बार ट्रांसफर आदेश जारी होने के बावजूद कार्यमुक्त न होना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं ‘सिस्टम’ ही इन अधिकारियों का ढाल बना हुआ है।
विकास कार्यों पर मंडराते खतरे और बढ़ता जन-आक्रोश
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:इन विवादों का सीधा असर जिले के विकास कार्यों पर पड़ रहा है। फाइलों का रुकना, भुगतान में देरी और जनप्रतिनिधियों के साथ टकराव ने ग्रामीण विकास की गति को धीमा कर दिया है। अधिकारियों की इस मनमानी से न केवल कर्मचारी वर्ग में असंतोष है, बल्कि आम जनता का प्रशासनिक पारदर्शिता से भरोसा उठता जा रहा है।
GPM जिले में ‘संरक्षण बनाम कार्रवाई’ की जंग:यह मामला अब केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता का है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह विवाद आने वाले समय में एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।









