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जब देश मना रहा था आज़ादी का जश्न, तब इस फिल्म ने रचा इतिहास, जानें ‘शहनाई’ की अनसुनी कहानी

नई दिल्ली: तब इस फिल्म ने रचा इतिहास, जानें ‘शहनाई’ की अनसुनी कहानी, 15 अगस्त 1947… यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत थी। जब पूरा भारत गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आज़ादी का जश्न मना रहा था, तब इस ऐतिहासिक दिन ने न केवल देश का भविष्य बदला, बल्कि हिंदी सिनेमा को भी एक नई दिशा दी। इसी दिन रिलीज हुई फिल्म ‘शहनाई’ ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के ऐसे झंडे गाड़े, जिसने मनोरंजन जगत में एक नया अध्याय लिख दिया।

आज़ादी के दिन की ब्लॉकबस्टर ‘शहनाई’

निर्देशक पी. एल. संतोषी की यह फिल्म उस दौर की एक बड़ी हिट साबित हुई। 133 मिनट लंबी इस फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार सी. रामचंद्र ने दिया था। फिल्म ने यह साबित कर दिया कि बंटवारे के दर्द और अनिश्चितता के माहौल के बीच, सिनेमा लोगों के लिए खुशी और उम्मीद का एक बड़ा जरिया बन सकता है।तब इस फिल्म ने रचा इतिहास, जानें ‘शहनाई’ की अनसुनी कहानी

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एक गाना जिसने मचा दिया था तहलका

‘शहनाई’ का सबसे बड़ा आकर्षण बना इसका गाना “आना मेरी जान, मेरी जान… संडे के संडे”। शमशाद बेगम और सी. रामचंद्र की आवाज़ में यह गाना आज़ादी के साल का सबसे बड़ा चार्टबस्टर बना। इस गाने की धुन में वेस्टर्न म्यूजिक का जो तड़का था, वह उस दौर के लिए बिल्कुल नया प्रयोग था। अभिनेत्री दुलारी और अभिनेता मुमताज अली पर फिल्माया गया यह गाना लोगों की जुबान पर चढ़ गया और जश्न के माहौल को दोगुना कर दिया।तब इस फिल्म ने रचा इतिहास, जानें ‘शहनाई’ की अनसुनी कहानी

लोकप्रियता के साथ विवादों का साया

हालांकि, यह गाना जितना लोकप्रिय हुआ, उतने ही विवादों में भी घिर गया।

  • कई आलोचकों ने इसे “तुच्छ” और “अश्लील” करार दिया।

  • उस समय की मशहूर फिल्म पत्रिका ‘फिल्म इंडिया’ में एक पाठक ने पत्र लिखकर आरोप लगाया कि ऐसे गाने युवाओं के नैतिक चरित्र को बिगाड़ सकते हैं।

लेकिन समय के साथ इस गाने को लेकर लोगों का नजरिया बदला। 90 के दशक में नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) ने इसी गाने की धुन पर अपना मशहूर विज्ञापन “खाना मेरी जान, मेरी जान… मुर्गी के अंडे” बनाया, जो घर-घर में गूंजने लगा।तब इस फिल्म ने रचा इतिहास, जानें ‘शहनाई’ की अनसुनी कहानी

15 अगस्त बन गया बॉलीवुड का ‘लकी चार्म’

‘शहनाई’ की सफलता ने फिल्म निर्माताओं को एक नया फॉर्मूला दे दिया। उन्होंने समझा कि त्योहारों और राष्ट्रीय पर्वों के मौके पर फिल्में रिलीज करने से कमाई कई गुना बढ़ जाती है। 1947 से 1950 के बीच ‘मेला’ और ‘चंद्रलेखा’ जैसी कई बड़ी फिल्में 15 अगस्त के आसपास रिलीज की गईं और सभी ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई की। यह ट्रेंड आज भी बॉलीवुड में कायम है।तब इस फिल्म ने रचा इतिहास, जानें ‘शहनाई’ की अनसुनी कहानी

Dr. Tarachand Chandrakar

Editor-in-Chief

डॉ. ताराचंद चंद्राकर एक प्रखर विचारक और अनुभवी पत्रकार हैं, जो 'निडर छत्तीसगढ़' के माध्यम से निष्पक्ष और बेबाक पत्रकारिता को नई दिशा दे रहे हैं। तथ्यों की शुद्धता और सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता ने उन्हें डिजिटल पत्रकारिता में एक विश्वसनीय नाम बनाया है।

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