छत्तीसगढ़ की दर्दनाक हकीकत: पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं, 4 दिन झोपड़ी में रहने को मजबूर!

छत्तीसगढ़ की दर्दनाक हकीकत: पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं, 4 दिन झोपड़ी में रहने को मजबूर!
एक तरफ डिजिटल इंडिया और आधुनिकता की बयार, दूसरी तरफ आदिवासी अंचलों में आज भी कुछ ऐसी कुप्रथाएं जीवित हैं जो महिलाओं के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। छत्तीसगढ़ के नवगठित मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के कई गांवों में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं को आज भी घर से बाहर, एक असुरक्षित और अस्वच्छ झोपड़ीनुमा कुटिया में रहने को विवश किया जाता है। यह स्थिति न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है, बल्कि उनके मानवाधिकारों का भी खुला उल्लंघन है।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं
क्या है यह दर्दनाक परंपरा?
देश और दुनिया भले ही 21वीं सदी में जी रहे हों, जहां तकनीक और स्वास्थ्य सेवाओं में अभूतपूर्व प्रगति हुई है, लेकिन छत्तीसगढ़ के इन आदिवासी बहुल गांवों में रूढ़िवादी परंपराएं आज भी समाज पर हावी हैं। यहां की महिलाएं इसका सबसे बड़ा दंश झेल रही हैं।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं
अमानवीय क्वारंटाइन: मासिक धर्म शुरू होते ही महिलाओं को घर से ‘बेदखल’ कर दिया जाता है। उन्हें गांव के बाहर या घर से कुछ दूरी पर बनी एक छोटी, बदबूदार और असुरक्षित झोपड़ी में तीन से चार दिन बिताने पड़ते हैं।
सुविधाओं का अभाव: इन झोपड़ियों में बिजली, पानी, बिस्तर जैसी मूलभूत सुविधाओं का नामों-निशान नहीं होता। महिलाओं को गंदगी और जहरीले जीव-जंतुओं के खतरे के बीच ये कठिन दिन गुजारने पड़ते हैं।
संक्रमण का खतरा: स्वच्छ पानी और सैनिटरी नैपकिन की अनुपलब्धता के कारण संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
क्यों जीवित है यह कुप्रथा?
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उनका मानना है कि पुराने समय में मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता और सुरक्षा के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं थे। इसलिए, परिवार को संक्रमण से बचाने और तथाकथित ‘अशुद्धता’ से दूर रखने के लिए महिलाओं को घर से बाहर अलग रखा जाता था। अफसोस की बात यह है कि समय बदलने के बावजूद यह मानसिकता नहीं बदली।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं
प्रभावित क्षेत्र: मानपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले मदनवाड़ा, हुरले, हुरेली, रेतेगांव, सीतागांव, औंधी जैसे कई अंदरूनी गांवों में आज भी घरों के बाहर ये झोपड़ियां आसानी से देखी जा सकती हैं।
कोशिशें जो अधूरी रह गईं
विभिन्न सामाजिक संगठनों और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने इस कुप्रथा को खत्म करने और जागरूकता फैलाने की कोशिशें कीं, लेकिन ये प्रयास “चार दिन की चांदनी” साबित हुए।
प्रशासनिक उदासीनता: पाताल भैरवी मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेश मारू व कमलेश सिमनकर बताते हैं कि तत्कालीन कलेक्टर भीम सिंह को मामले की जानकारी देकर प्रशासनिक स्तर पर सुधार के प्रयास शुरू करवाए गए थे। महिला एवं बाल विकास विभाग को इन क्षेत्रों में निरंतर निगरानी करने और महिलाओं व युवतियों को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन वितरित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन कुछ समय बाद यह पहल भी ठंडे बस्ते में डाल दी गई।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं
जागरूकता का अभाव: सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक अंगद सलामे (मानपुर) का कहना है कि यह परंपरा बहुत पुरानी है और महिलाओं को इसमें भारी जोखिम उठाना पड़ता है। इसे बदलने के लिए प्रशासन को सतत और ठोस पहल करनी होगी।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं
क्या कहते हैं अधिकारी?
महिला एवं बाल विकास अधिकारी, एमएमएसी, सी.एच. मिश्रा का कहना है कि क्षेत्र के कुछ गांवों में यह परंपरा खत्म हुई है। वे मितानिनों के माध्यम से सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने और मानसिकता में बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर नजर आती है।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं
आगे की राह: सतत प्रयासों की आवश्यकता
यह स्पष्ट है कि इस गहरी जड़ें जमा चुकी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए केवल सामयिक प्रयासों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए एक व्यापक, सतत और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
निरंतर जागरूकता अभियान: स्थानीय भाषा और संस्कृति को ध्यान में रखते हुए आकर्षक और प्रभावी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।
स्वास्थ्य और स्वच्छता: महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन की नियमित और मुफ्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। उन्हें मासिक धर्म स्वच्छता के महत्व के बारे में शिक्षित किया जाए।
शिक्षा और सशक्तिकरण: लड़कियों की शिक्षा पर जोर दिया जाए ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो सकें और ऐसी कुप्रथाओं का विरोध कर सकें।
सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय नेताओं, धार्मिक गुरुओं और समुदाय के प्रभावशाली व्यक्तियों को इस अभियान में शामिल किया जाए।
कानूनी संरक्षण (यदि आवश्यक हो): महिलाओं के स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा के लिए उचित कानूनी उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
जब तक समाज और प्रशासन मिलकर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तब तक ‘सुशासन’ और ‘विकास’ के दावे खोखले ही साबित होंगे और महिलाएं इस अमानवीय परंपरा का शिकार होती रहेंगी।पीरियड्स में ‘अछूत’ महिलाएं



















