Silver Price Hike: ‘दुल्हन लाऊं या चांदी?’ Tribal culture की वो त्रासदी जो अब एक Viral Song बन चुकी है!
Silver Price Hike का आदिवासी संस्कृति पर बड़ा असर। झाबुआ के कलाकार पूनम डामोर के वायरल गीत 'लाड़ी लाऊं के चांदी लूं' ने बयां किया शादियों में चांदी का दर्द।

Silver Price Hike: Silver Price Impact on Tribal Weddings: आज के दौर में चांदी (Silver) सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि निवेश का बड़ा जरिया है। लेकिन मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों (Tribal Areas) के लिए बढ़ती कीमतें एक बड़ी त्रासदी (Tragedy) बनकर उभरी हैं। झाबुआ के एक युवा कलाकार ने इस दर्द को एक ऐसे लोकगीत में पिरोया है, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
‘लाड़ी लाऊं के चांदी लूं?’ – एक कलाकार की जुबानी, आदिवासियों की परेशानी
Silver Price Hike: मध्य प्रदेश के झाबुआ (Jhabua) जिले के युवा कलाकार पूनम डामोर (Poonam Damor) का एक गीत इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। इस गीत के बोल हैं— “लाड़ी लाऊं के चांदी लूं, जिव करे हूं मरी जऊं” (दुल्हन लाऊं या चांदी खरीदूं, मन कर रहा है कि मर ही जाऊं)।
Music Director कुलदीप भूरिया के संगीत से सजे इस गीत में उस विडंबना को दिखाया गया है, जहां Silver Prices में बेतहाशा बढ़ोतरी ने एक गरीब आदिवासी युवक के सामने शादी या चांदी में से किसी एक को चुनने की नौबत ला दी है।
क्यों बढ़ रहा है आदिवासियों पर बोझ? (The Debt Trap)
Silver Price Hike: आदिवासी समाज में चांदी को समृद्धि (Prosperity) का प्रतीक माना जाता है। शादी के दौरान चांदी के जेवर देना एक अनिवार्य परंपरा है। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं:
जमीन और मवेशी बेचने की नौबत: गीत के बोल – “घर-नी जमीन वेची दूं, लाड़ी ना बा चांदी मांगे” – दिल को झकझोर देते हैं। कई युवा अपनी शादी के लिए पुश्तैनी जमीन और घर के मवेशी (Cattle) तक बेचने को मजबूर हैं।
Heavy Interest Rates: चांदी खरीदने के लिए लोग साहूकारों से कर्ज ले रहे हैं। चांदी महंगी होने के कारण ब्याज का बोझ इतना बढ़ जाता है कि परिवार कर्ज के जाल (Debt Trap) में फंस जाते हैं।
Social Pressure: समाज में अच्छे और भारी जेवरों की तारीफ होती है, जबकि कम वजन के जेवर चर्चा का विषय बन जाते हैं। यही सामाजिक दबाव (Social Pressure) गरीब परिवारों की कमर तोड़ रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट: “कर्ज लेकर बनवाने पड़ेंगे जेवर”
Silver Price Hike: सावलमेंढा गांव के राजेश सरियाम बताते हैं कि आदिवासी समाज में परिवार चाहे कितना भी गरीब क्यों न हो, चांदी के जेवर ले जाना एक अटूट परंपरा है। वहीं, सुमन जावरकर कहती हैं, “बेटे की शादी तय हो चुकी है, लेकिन असली चिंता चांदी के बाकड़े, पैर पट्टी, बिछिया और करधनी की है। अब रिश्तेदारों से कर्ज लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।”
आखिर चांदी ही क्यों?
Silver Price Hike: आदिवासी संस्कृति में चांदी का महत्व सिर्फ दिखावा नहीं, बल्कि उनकी पहचान से जुड़ा है। लेकिन Rising Silver Rates ने इस पहचान को अब ‘बोझ’ बना दिया है। झाबुआ से लेकर अलीराजपुर तक, हर गांव में इस समय यही चर्चा है कि आखिर परंपराओं को कैसे निभाया जाए जब कीमतें आसमान छू रही हों।



















