भाजपा के महिला मोर्चा प्रभारी पद पर पुरुष नेता की नियुक्ति, कांग्रेस ने उठाए सवाल

छत्तीसगढ़ भाजपा ने सात मोर्चों के प्रभारियों की सूची जारी की, जिसमें महिला मोर्चा की जिम्मेदारी सुभाष तिवारी को सौंपी गई। कांग्रेस ने इसे पार्टी के महिला सशक्तिकरण के दावों से जोड़कर सवाल खड़े किए हैं।
रायपुर में भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई ने हाल ही में अपने सात मोर्चों के प्रभारियों की नई सूची जारी की है। इसी सूची में महिला मोर्चा की संगठनात्मक जिम्मेदारी रायपुर के वरिष्ठ नेता सुभाष तिवारी को सौंपी गई है। एक महिला-केंद्रित संगठन की कमान पुरुष नेता को दिए जाने के बाद छत्तीसगढ़ की सियासत में यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है।

पार्टी के इस फैसले पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा है कि भाजपा मंचों पर महिला सशक्तिकरण की बात करती है, लेकिन संगठनात्मक नियुक्तियों में उसका व्यवहार अलग नजर आता है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या पार्टी के पास इस जिम्मेदारी के लिए कोई सक्षम महिला नेता नहीं थी।
किसे मिली कौन-सी जिम्मेदारी?
भाजपा प्रदेश संगठन ने कुल सात मोर्चों के लिए नए प्रभारी घोषित किए हैं। सूची इस प्रकार है:

- युवा मोर्चा – वैभव बैस
- महिला मोर्चा – सुभाष तिवारी
- किसान मोर्चा – पूनम चंद्राकर
- पिछड़ा वर्ग मोर्चा – लखनलाल साहू
- अनुसूचित जनजाति मोर्चा – शिरीष अग्रवाल
- अनुसूचित जाति मोर्चा – डॉ. गुलाब टिकरिहा
- अल्पसंख्यक मोर्चा – मनोज जैन
इस पूरी सूची में सबसे ज्यादा चर्चा महिला मोर्चा की नियुक्ति को लेकर हो रही है, क्योंकि यह इकलौता ऐसा मोर्चा है जिसका सीधा जुड़ाव महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व और सहभागिता से है।
कौन हैं सुभाष तिवारी?
सुभाष तिवारी रायपुर के टिकरापारा क्षेत्र से जुड़े भाजपा के वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं और रायपुर नगर निगम में पूर्व पार्षद रह चुके हैं। पार्टी के भीतर उन्हें संगठनात्मक कामकाज का लंबा अनुभव रखने वाले नेताओं में गिना जाता है। पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उनकी नियुक्ति महतारी वंदन योजना जैसे महिला-केंद्रित कार्यक्रमों से जुड़े मतदाता आधार को संगठित रखने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

विवाद की जड़ क्या है?
भाजपा लंबे समय से अपने राजनीतिक नैरेटिव में नारी शक्ति और महिला सशक्तिकरण को प्रमुखता से पेश करती रही है। प्रधानमंत्री स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक पार्टी के नेता महिलाओं को नेतृत्व में आगे लाने की बात करते रहे हैं। महिला मतदाताओं को भाजपा की राजनीति का एक मजबूत आधार भी माना जाता रहा है।
ऐसे में जब महिला मोर्चे जैसे संगठन के प्रभारी पद पर किसी महिला नेता के बजाय पुरुष नेता की नियुक्ति हुई, तो यह स्वाभाविक रूप से बहस का विषय बन गया।
भाजपा संगठन का पक्ष क्या हो सकता है?
पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के अनुसार, किसी मोर्चे का “प्रभारी” पद उस मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष पद से अलग होता है। प्रभारी की भूमिका मुख्य रूप से संगठन और मोर्चे के बीच समन्वय बनाने, गतिविधियों की निगरानी करने और राजनीतिक मार्गदर्शन देने तक सीमित मानी जाती है। मोर्चे का वास्तविक नेतृत्व निर्वाचित या नियुक्त महिला पदाधिकारियों के पास ही रहता है। इस आधार पर तकनीकी रूप से किसी भी वर्ग का नेता किसी मोर्चे का प्रभारी बनाया जा सकता है।
कांग्रेस का हमला
कांग्रेस ने इस नियुक्ति को भाजपा और आरएसएस की कथित महिला-विरोधी सोच से जोड़ा है। पार्टी प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने यह भी कहा कि हाल ही में सरकार ने महिला जनप्रतिनिधियों—महापौर, पार्षद, पंच और सरपंच—के कामकाज में उनके पतियों के हस्तक्षेप को रोकने के लिए नियमों में बदलाव किया था। ऐसे में महिला मोर्चे की जिम्मेदारी किसी पुरुष नेता को दिया जाना, कांग्रेस के अनुसार, पार्टी के रुख में विरोधाभास दिखाता है।
कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या भाजपा संगठन में महिला नेतृत्व की कमी है, या पार्टी जानबूझकर महिलाओं को शीर्ष जिम्मेदारियों से दूर रखना चाहती है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल भाजपा की ओर से इस नियुक्ति को लेकर कोई औपचारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। संगठन के भीतर इसे नियमित प्रशासनिक फैसला बताया जा रहा है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इस आलोचना पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देती है या नहीं, और क्या महिला मोर्चा की स्थानीय इकाइयों में महिला पदाधिकारियों की भूमिका को लेकर कोई नई घोषणा होती है।









