छत्तीसगढ़ का नामकरण: 36 गढ़ों का रहस्य और इसके प्रसिद्ध मंदिरों की गौरवगाथा

छत्तीसगढ़ का नामकरण: 36 गढ़ों का रहस्य और इसके प्रसिद्ध मंदिरों की गौरवगाथा
भारत का हृदयस्थल छत्तीसगढ़ न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है, बल्कि अपने नाम के पीछे छिपे ऐतिहासिक रहस्य और अनगिनत आस्था के केंद्रों के लिए भी प्रसिद्ध है। आइए, हम छत्तीसगढ़ के नामकरण की कहानी और यहां के कुछ प्रमुख मंदिरों के महत्व को विस्तार से जानते हैं।36 गढ़ों का रहस्य और इसके प्रसिद्ध मंदिरों की गौरवगाथा
छत्तीसगढ़: नाम के पीछे का इतिहास और मान्यताएँ
छत्तीसगढ़ राज्य, जो 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आया, का इतिहास सदियों पुराना है। इसके नामकरण को लेकर कई मत प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:-
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पौराणिक पहचान: दक्षिण कोशल
रामायण काल में इस क्षेत्र को ‘दक्षिण कोशल’ के नाम से जाना जाता था। वाल्मीकि रामायण में भी उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल का उल्लेख मिलता है। महान कवि कालिदास के समय में अवध को उत्तर कोशल और वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र को कोशल कहा गया। यह वही कोशल प्रदेश है जहाँ से भगवान श्रीराम की माता कौशल्या थीं, जिस कारण छत्तीसगढ़ को श्रीराम का ननिहाल भी माना जाता है। -
36 गढ़ों की कहानी: गोंड राजाओं का शासन
सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, लगभग 300 साल पहले गोंड जनजाति के शासनकाल में इस क्षेत्र में उनके 36 किले या ‘गढ़’ हुआ करते थे। इन्हीं ‘छत्तीस’ (36) ‘गढ़ों’ के कारण इस प्रदेश का नाम ‘छत्तीसगढ़’ पड़ा। यह नाम मराठा काल में भी काफी लोकप्रिय हुआ और 1795 में अंग्रेजों के एक आधिकारिक दस्तावेज़ में भी ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का प्रयोग किया गया। -
अन्य मत:
कुछ विद्वानों का मानना है कि एक प्रसिद्ध देवी मंदिर के 36 स्तंभों के आधार पर इसका नाम छत्तीसगढ़ पड़ा, हालांकि ’36 गढ़ों’ वाली थ्योरी अधिक व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है।
छत्तीसगढ़: आस्था और आध्यात्मिकता का केंद्र – प्रमुख मंदिर
छत्तीसगढ़ को “धर्म का गढ़” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ अनगिनत प्राचीन और सिद्ध मंदिर हैं जो भक्तों की आस्था के केंद्र हैं। यहाँ कुछ प्रमुख मंदिरों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:
राजनांदगांव जिले के मंदिर:
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माँ बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़: राजनांदगांव जिले में, डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर माँ बम्लेश्वरी को समर्पित है और छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
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करेला भवानी मंदिर, करेला: करेला गाँव में स्थित यह मंदिर माँ करेला भवानी (देवी दुर्गा का एक रूप) को समर्पित है और स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रतीक है।
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पाताल भैरवी मंदिर, राजनांदगांव: यह मंदिर तीन स्तरों में निर्मित है, जिसमें सबसे नीचे पाताल भैरवी, मध्य में नवदुर्गा या त्रिपुर सुंदरी और शीर्ष पर द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमाएं हैं।
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गंगई माता मंदिर, गण्डई: गण्डई नगर की अधिष्ठात्री देवी मां गंगई का यह मंदिर नवरात्रि में विशेष आकर्षण का केंद्र होता है।
महासमुंद जिले के मंदिर:
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चंडीमाता मंदिर, बागबाहारा: नील पर्वत पर स्थित इस मंदिर तक रोपवे (उड़नखटोला) द्वारा भी पहुंचा जा सकता है।
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खल्लारी माता मंदिर, भीमखोज: पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। भीम के पदचिन्हों के कारण इसे भीमखोज भी कहते हैं।
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मुंगई माता मंदिर, बावनकेरा: “भालू मंदिर” के नाम से भी प्रसिद्ध इस पहाड़ी मंदिर में भालुओं का आना-जाना एक विशेष आकर्षण है।
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चंडी माता मंदिर, बिरकोनी: मान्यता है कि वनवास के दौरान अर्जुन ने यहां चंडी माता की तपस्या कर विजय का वरदान प्राप्त किया था।
रायगढ़ जिले के मंदिर:
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बूढ़ी माई मंदिर, रायगढ़: तराईमाल रोड पर स्थित यह मंदिर मां बंजारी के साथ ही बूढ़ी माई को समर्पित है।
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बंजारी माता मंदिर, रायगढ़: तराई माल गांव में स्थित यह मंदिर बंजारों द्वारा स्थापित देवी बंजारी को समर्पित है।
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अंबेटिकरा माता मंदिर, धरमजयगढ़: मांड नदी के पास स्थित यह मंदिर दुर्गा माता को समर्पित है और इसका निर्माण 1930 में हुआ था।
जांजगीर-चांपा और सक्ती जिले के मंदिर:
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चंद्रहासिनी मंदिर, चंद्रपुर (सक्ती): महानदी के तट पर स्थित यह सिद्ध शक्तिपीठ मां चंद्रहासिनी को समर्पित है और नवरात्रि में यहाँ भव्य मेला लगता है।
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नाथलदाई मंदिर, चंद्रपुर (सक्ती): मां चंद्रहासिनी मंदिर के समीप ही महानदी के तट पर यह प्राचीन मंदिर स्थित है।
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अष्टभुजी माता मंदिर, अड़बहार (सक्ती): मालखरौदा तहसील के अड़भार में स्थित यह दक्षिणमुखी काली मंदिरों में से एक है।
रायपुर जिले के मंदिर:
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बंजारी माता मंदिर, रायपुर: यह मंदिर देवी बंजारी माता को समर्पित है और दशहरा व नवरात्रि में विशेष आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है।
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बंजारी माता मंदिर, खपरी मड़ी, रायपुर: खपरी मड़ी में स्थित यह भी बंजारी माता का एक प्रसिद्ध मंदिर है।
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कौशल्या माता मंदिर, चंद्रखुरी (राम वन गमन मार्ग): इसे भगवान राम की माता कौशल्या का जन्मस्थान माना जाता है। यहाँ माता कौशल्या की गोद में बालरूप राम की प्रतिमा है।
बिलासपुर जिले के मंदिर:
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महामाया मंदिर, रतनपुर: देवी महालक्ष्मी और दुर्गा को समर्पित यह मंदिर भारत के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
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मरही माता मंदिर, भवरकंटक: बिलासपुर-कटनी रेल लाइन पर स्थित इस मंदिर के पास ट्रेनों की गति धीमी हो जाने की मान्यता है।
बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले के मंदिर:
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दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा: देवी दंतेश्वरी को समर्पित यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि यहाँ देवी सती का दांत गिरा था। यह शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर है।
धमतरी जिले के मंदिर:
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अंगार मोती माता मंदिर, धमतरी: यह एक लोकप्रिय पर्यटन और धार्मिक स्थल है।
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बिलाई माता मंदिर, धमतरी: इस मंदिर की उत्पत्ति से जुड़ी दो जनश्रुतियां प्रचलित हैं, एक गोंड नरेश और दूसरी कांकेर नरेश से संबंधित।
गरियाबंद जिले के मंदिर:
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जतमई माता मंदिर, गरियाबंद: घने जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर माता जतमई को समर्पित है और अपनी नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।
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घटारानी माता मंदिर, गरियाबंद: जतमई मंदिर के पास ही स्थित इस मंदिर के समीप एक सुंदर झरना भी है, जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाता है।
सूरजपुर जिले के मंदिर:
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कुदरगढ़ी माता मंदिर, सूरजपुर: कुदरगढ़ में एक पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 800 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
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महामाया माता मंदिर, सूरजपुर: यह भी कुदरगढ़ी माता मंदिर के क्षेत्र में ही स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
जशपुर जिले के मंदिर:
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खुड़िया रानी मंदिर, जशपुर: बगीचा क्षेत्र में एक गुफा के अंदर स्थित इस मंदिर तक डोकरी नदी के किनारे सीढ़ियों से उतरकर पहुंचा जाता है।
कोरबा जिले के मंदिर:
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मड़वा रानी माता मंदिर, कोरबा: स्थानीय निवासियों की गहरी आस्था का प्रतीक यह मंदिर माँ मड़वारानी को समर्पित है।
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सर्वमंगला माता मंदिर, कोरबा: कोरबा के जमींदार परिवार द्वारा निर्मित यह मंदिर मां दुर्गा को समर्पित है।
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महिषासुर मर्दिनी माता मंदिर, चैतुरगढ़, कोरबा: चैतुरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर महिषासुर मर्दिनी के रूप में देवी की आराधना का केंद्र है।
कवर्धा (कबीरधाम) जिले के मंदिर:
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महामाया मंदिर, कवर्धा: डोंगरिया में स्थित यह मंदिर देवी महामाया को समर्पित है और नवरात्रियों में यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है।
बेमेतरा जिले के मंदिर:
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माँ शक्ति मंदिर, शक्तिघाट, बेमेतरा: 1970 के दशक में स्थानीय निवासियों की सामूहिक इच्छा से इस दुर्गा मंदिर का निर्माण हुआ।
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सिद्धी माता मंदिर, सण्डी, बेमेतरा: ग्राम सण्डी में स्थित यह मंदिर सिद्धि माता को समर्पित है।
बालोद जिले के मंदिर:
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सीया देवी माता मंदिर, बालोद: नारा गांव की पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है।
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गंगा मैया मंदिर, झलमला, बालोद: बालोद-दुर्ग रोड पर स्थित यह ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का स्थल है।
बलौदा बाजार जिले के मंदिर:
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हिंगलाज माता (जेवरा दाई) मंदिर, देव सागर: मान्यता है कि यहाँ देवी सती का सिर गिरा था, यह स्थान हिंदुओं के लिए पवित्र तीर्थ है।
छत्तीसगढ़ वास्तव में “36 गढ़ों” की ऐतिहासिक विरासत और अनगिनत पवित्र मंदिरों की आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम है। यह राज्य अपने नाम के रहस्य के साथ-साथ अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के कारण भी भारत के मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान रखता है।36 गढ़ों का रहस्य और इसके प्रसिद्ध मंदिरों की गौरवगाथा









