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UNESCO के मंच पर छाया छत्तीसगढ़ का ‘गेड़ी नृत्य’: 180 देशों के सामने कलाकारों ने जमाया रंग, लाल किले से गूंजा- ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’

UNESCO के मंच पर छाया छत्तीसगढ़ का ‘गेड़ी नृत्य’: 180 देशों के सामने कलाकारों ने जमाया रंग, लाल किले से गूंजा- ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’, छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू और पारंपरिक लोक कला की गूंज अब पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है। हाल ही में नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय समारोह में छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध ‘गेड़ी नृत्य’ (Gedi Dance) ने ऐसा समां बांधा कि यूनेस्को (UNESCO) भी इसका कायल हो गया। ‘लोक श्रृंगार भारती’ संस्था के कलाकारों ने अपने करतबों से 180 देशों के प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

यहाँ जानिए इस ऐतिहासिक उपलब्धि की पूरी कहानी:

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1. लाल किले पर संस्कृति का महाकुंभ: 180 देशों की भागीदारी

नई दिल्ली के लाल किला प्रांगण में 7 से 13 दिसंबर तक यूनेस्को और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक भव्य समारोह आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में दुनिया भर के 180 देशों के डेलीगेट्स (प्रतिनिधि) शामिल हुए। इसी मंच पर दीपावली को यूनेस्को द्वारा ‘विश्व सांस्कृतिक धरोहर’ के रूप में मान्यता देने का ऐतिहासिक ऐलान भी हुआ। इसी गौरवशाली पल में छत्तीसगढ़ के गेड़ी लोक नृत्य दल ने अपनी धमाकेदार प्रस्तुति दी।UNESCO के मंच पर छाया छत्तीसगढ़ का ‘गेड़ी नृत्य

2. केंद्रीय मंत्री बोले- ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’

गेड़ी नर्तक दल का नेतृत्व कर रहे मुख्य गायक और निर्देशक अनिल गढ़ेवाल और उनकी टीम ने जैसे ही मंच संभाला, पूरा माहौल छत्तीसगढ़ी रंग में रंग गया। कलाकारों का संतुलन और ऊर्जा देखकर वहां मौजूद केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” कहकर कलाकारों का हौसला बढ़ाया।UNESCO के मंच पर छाया छत्तीसगढ़ का ‘गेड़ी नृत्य

कार्यक्रम में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, दिल्ली की नेत्री रेखा गुप्ता और अन्य गणमान्य नागरिक मौजूद थे, जिन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का अभिनंदन किया।UNESCO के मंच पर छाया छत्तीसगढ़ का ‘गेड़ी नृत्य

3. ‘काट ले हरियर बांसे’ और साहसिक करतब

प्रस्तुति के दौरान अनिल गढ़ेवाल के गीत “काट ले हरियर बांसे” ने विदेशी मेहमानों के दिलों को छू लिया। वहीं, वादक मोहन डोंगरे ने एक ही जगह घूमते हुए जब मांदल बजाया, तो दर्शक हैरान रह गए। हारमोनियम पर सौखी लाल कोसले और बांसुरी पर महेश नवरंग की जुगलबंदी ने समां बांध दिया।

सबसे रोमांचक पल वह था जब नर्तकों ने बांस की गेड़ी पर चढ़कर पिरामिड और मानवीय संरचनाएं बनाईं। प्रभात बंजारे, सूरज खांडे, शुभम भार्गव, लक्ष्मी नारायण माण्डले, फूलचंद ओगरे और मनोज माण्डले के साहसिक संतुलन को देख पूरा प्रांगण तालियों से गूंज उठा।UNESCO के मंच पर छाया छत्तीसगढ़ का ‘गेड़ी नृत्य

4. यूनेस्को महानिदेशक के साथ खास पल

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा—कौड़ियों की माला, मयूर पंख, पटसन के वस्त्र और सिकबंध—ने कलाकारों को और भी आकर्षक बना दिया था। इस वेशभूषा और नृत्य से प्रभावित होकर यूनेस्को के महानिदेशक डॉ. खालिद एन. एनानी और कई देशों के प्रतिनिधियों ने कलाकारों के साथ फोटो खिंचवाई और छत्तीसगढ़ को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए शुभकामनाएं दीं।

Pooja Chandrakar

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