आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग

आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग
अब नही चलेगी बहानेबाजी
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- राज्य सूचना आयुक्त का एतिहासिक फैसला
- उपायुक्त सहकारिता होंगे लोक सूचना अधिकारी
- संयुक्त आयुक्त होंगे प्रथम अपीलीय अधिकारी
- एक महीने के भीतर प्रभावी होगा आदेश
NCG News desk MP:-
भोपाल। सहकारिता विभाग में अब सूचना के अधिकार को लेकर पैदा की जा रही भ्रम की स्थिति नहीं रहेगे। अब समूचा सहकारिता विभाग एवं सहकारी समितियां सब आरटीआई के दायरे में होंगी। अब किसी भी जानकारी की मांग करने पर सहकारिता विभाग बहानेबाजी नहीं कर सकता। वह यह नहीं कह सकता है कि सहकारिता विभाग में आरटीआई लागू नहीं है। वह यह नहीं कह सकता कि आवेदक को एक ही विषय या विशिष्ट विषय की जानकारी दी जा सकती है। वह यह नहीं कह सकता कि उसे आरटीआई की जानकारी देने से छूट मिली हुई है। इस मामले में कई अपीलों पर एक साथ सुनवाई करते हुये राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने एतिहासिक फैसला दिया है। प्रदेश में अनाज का उपार्जन, राशन दुकानो का संचालन करने वाली सभी सहकारी समितियों को सूचना अधिकार के अधीन लाया गया है। आयुक्त राज्य सूचना श्री सिंह ने राशन की दुकानों में कार्य करने वाले सेल्समैन के वेतन संबंधी गड़बड़ी उजागर होने पर जानकारी पोर्टल पर स्वतः प्रदर्शित करने के निर्देश जारी किये हैं।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )
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अब समितियों की खुलेगी पोल
सभी प्रकार की सहकारी समितियों को आरटीआई के दायरे में लाने पर अब ऐसी समितियों में हुये घोटालों का पर्दाफास निकट भविष्य में होगा। खाद्यात्र उपार्जन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, गृह निर्माण समितियां, दुग्ध उत्पादन समितियां आदि जो भी सहकारी समितियां पंजीकृत होंगी, सक्रिय या निष्क्रिय स्थिति में होंगी वहां पारदर्शिता सुनिश्चित होगी और भ्रष्ट गतिविधियों पर अंकुश लगेगा। भ्रष्टाचारियों को बचाने वाले सहकारिता विभाग के भ्रष्ट अधिकारी भी अब कुछ नहीं कर पायेंगे। जो अक्सर आरटीआई के आवेदन पत्रों में मांगी गई जानकारी न देकर जानकारियों को छिपाने का प्रयास करते थे और मनगढन्त कारणों के आधार पर आरटीआई लागू न होने का बहाना कर रहे थे।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )

आरटीआई एक्टीविस्टों ने किया फैसले का स्वागत
सहकारी समितियों को आरटीआई के दायरे में लाये जाने का कई एक्टीविस्टों में राज्य सूचना आयुक्त के फैसले का स्वागत किया है। ऐक्टीविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने कहा हे कि सहकारी समितियों को आरटीआई के दायरे में शामिल करने से प्रदेश के किसानों, आम नागरिकों व समितियों के हितग्राहियों के साथ बहुत बड़ा न्याय किया गया है। अभी तक समितियां किसानों को उनके केसीसी, कर्ज, ब्याज, अनुदान, उपार्जन, राशन एवंअन्य खाद बीज आदि की जानकारी उपलब्ध नही कराती थी और स्वयं को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर होना बताया करती थी। किन्तु इस आदेश का व्यापक असर होगा जो न केवल प्रदेश अपितु उसके बाहर भी हो सकता है। भारतीय किसान संघ के प्रांत प्रचारक प्रमुख मध्यभारत राहुल धूत ने कहा कि निर्णय स्वागत योग्य है। सहकारी समितियों को पारदर्शी होना बहुत जरूरी है। इससे समितियों की मनमानी पर रोग लगेगी।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )
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आठ मामलों में एक साथ सुनवाई
बताया गया है कि राज्य सूचना आयुक्त ने आठ मामलों की एक साथ सुनवाई की। आयोग के समथ सहकारिता विभाग में आरटीआई के आवेदनों में जानकारी न देने व तरह-तरह के बहाने करने के विषय में कई शिकायतें हुई थी। कई विक्रेताओं ने पीडीएस में काम करने व वेतन के संबंध में जानकारी चाही थी। किन्तु जानकारी उन्हें नहीं दी गई थी। उन्हें यह कहा जाता था कि आरटीआई वहां लागू ही नहीं है। 2005 जब से आरटीआई लागू हुआ तब से सहकारी समितियां सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुये अपने आपकों आरटीआई से बाहर बता रही थी। किन्तु अब ऐसा नही होगा।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )
क्या कहता है अधिनियम ?
आरटीआई अधिनियम कहता है कि किसी भी संस्था को अधिनियम के अधीन लाने के लिये जरूरी हे कि वह संस्था कानूनी रूप से पब्लिक अथारिटी के रूप में स्थापित हो। या फिर किसी कानून या नियम के तहत अगर शासन उस संस्था से जानकारी प्राप्त करता हो। पब्लिक अथारिटी कोई भी संस्था तभी हो सकती है जब वह शासन के नियंत्रण में हो अथवा शासन द्वारा वित्त पोषित हो। प्रदेश के नियम में वित्त पोषित होने के संबंध में परिभाषित किया गया है कि अगर किसी संस्था में शासन का 50 हजार न्यूनतम परोक्ष या अपरोक्ष रूप से निवेश हो तो संस्था लोक प्राधिकारी होगी। इस परिभाषा के अनुसार सहकारिता विभाग पूरी तरह से पब्लिक अथारिटी की परिधि में आता है।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )
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आयोग की जांच में समितियों की भूमिका लोक प्राधिकारी के रूप में
सहकारी समितियों की भूमिका की जानकारी के लिए लोक सूचना अधिकारी नियुक्त किया है। जबकि संयुक्त आयुक्त सहकारित को प्रथम अपीलीय अधिकारी बनाया है। श्री सिंह ने प्रमुख सचिव सहकारिता विभाग आदेशित किया है कि वे खाद्यान उपार्जन एवं पीडीएस के संचालन में शामिल सहकारी समितियों को तत्काल प्रभाव से सूचना अधिकार अधिनियम के अधीन लाते हुये समितियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने के लिये जिलों के पदस्थ अधिकारियों की जबाबदेही एक महीने के भीतर सुनिश्चित करें। प्रमुख सचिव खाद्य को आदेशित किया गया है कि तीन माह के भीतर जिलों में राशन की दुकानों में कार्यरत सेल्समैनों के वेतन की जानकारी बेबसाइट पोर्टल पर अपलोड करवाना सुश्चित करें।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )
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विक्रेताओं के वेतन में व्यापक गड़बडी
आयोग की जांच में पाया गया है कि विक्रेताओं के वेतन संबंधी मुद्दे में व्यापक गड़बड़ी है। रीवा जिले में 459 विक्रेता कार्यरत है। किन्तु किसी भी विक्रेता को हर महीने वेतन नहीं दिया जाता। पांच विक्रेता ऐसी भी मिले जिन्हें 7-10 वर्ष से वेतन नहीं दिया गया। लगभग 70 से अधिक विक्रेता ऐसी है। जिन्हें दो साल से वेतन नहीं मिला। इसके आलावा विक्रेताओं के सहयोगी के रूप में भी कई कर्मचारी पदस्थ हैं उन्हें सेलरी के रूप में शायद कुछ भी नहीं मिलता। विधानसभा चुनाव के पहले विक्रेताओं ने प्रदेश भर में आदालन भी किया था किन्तु उसका कोई परिणाम नहीं निकला। वेतन प्रकरण में व्यापक गड़बड़ी को देखते हुये जांच करने की आवश्यकता बताई गई और प्रकरण प्रमुख सचिव खाद्य को युक्तियुक्त कार्रवाई के लिये भेजने के निर्देश भी दिये गये हैं। इस तरह से सहकारिता विभाग में अब आरटीआई के मामले में बहानेबाजी नहीं कर सकता।(आरटीआई के दायरे में सहकारिता विभाग )
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