दुष्कर्म मामला दबाने के आरोपी अंजुलुस खलखो हाईकोर्ट से बरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर के 2004 के मामले में धारा 201 के तहत दोषी ठहराए गए अंजुलुस खलखो को साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के एक पुराने मामले में अंजुलुस खलखो की सजा रद्द कर उन्हें बरी कर दिया है। निचली अदालत ने उन्हें दुष्कर्म की घटना को पंचायत के जरिए दबाने के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के तहत दोषी ठहराया था।

जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका। इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ दिया और उसकी अपील स्वीकार कर ली।
क्या है पूरा मामला?
अभियोजन के अनुसार, जनवरी 2004 में जशपुर जिले में 13 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। आरोप था कि घटना के बाद गांव में पंचायत बुलाई गई और पीड़िता के परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाया गया।

अंजुलुस खलखो पर आरोप था कि उन्होंने आरोपियों को कानूनी कार्रवाई से बचाने के मकसद से मामले को दबाने में भूमिका निभाई। यह अभियोजन का आरोप था, जिसे अब हाईकोर्ट में साबित हुआ नहीं माना गया।
निचली अदालत ने क्या सजा सुनाई थी?
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जशपुर ने 19 अप्रैल 2005 को फैसला सुनाया था। मुख्य बिंदु:

- धारा 201 (भारतीय दंड संहिता) के तहत दोषसिद्धि
- तीन साल का सश्रम कारावास
- एक हजार रुपये का जुर्माना
इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष धारा 201 के तहत अपराध साबित करने लायक ठोस साक्ष्य नहीं दे सका। कोर्ट ने इस स्थिति में दोषसिद्धि को बरकरार रखना उचित नहीं माना।
- निचली अदालत का दोषसिद्धि संबंधी फैसला निरस्त
- आरोपी की अपील स्वीकार
- संदेह का लाभ देते हुए बरी
धारा 201 क्या कहती है?
भारतीय दंड संहिता की धारा 201 अपराध के सबूत मिटाने या अपराधी को बचाने के लिए गलत जानकारी देने से जुड़ी है। ऐसे मामलों में अभियोजन को यह साबित करना होता है कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसा किया। इस मामले में हाईकोर्ट ने माना कि यह आरोप पर्याप्त साक्ष्य से सिद्ध नहीं हुआ।
इस फैसले का मतलब क्या है?
यह फैसला दोषसिद्धि के लिए ठोस साक्ष्य की जरूरत को रेखांकित करता है। बरी होने का अर्थ यह है कि अदालत ने इस विशेष आरोप को साबित हुआ नहीं माना। मूल घटना के अन्य आरोपियों के मामले या उनकी स्थिति के बारे में उपलब्ध जानकारी में कोई ब्योरा नहीं है, इसलिए उस पर यहां कुछ नहीं कहा जा रहा।









