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कागजों में सिमटा बेदखली आदेश, जमीन पर अब भी अवैध कब्जा: कोरबा प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

कोरबा: कागजों में सिमटा बेदखली आदेश, जमीन पर अब भी अवैध कब्जा: कोरबा प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, जिले में सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने के दावों और हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। ताज़ा मामला कोरबा के दर्री क्षेत्र का है, जहाँ एक निजी प्रतिष्ठान द्वारा शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे की पुष्टि होने और प्रशासन द्वारा बेदखली आदेश जारी होने के बावजूद, स्थिति जस की तस बनी हुई है।

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक कार्रवाई की गति और उसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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कलेक्टर जनदर्शन की शिकायत से खुला मामला

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2025 में हुई, जब कलेक्टर जनदर्शन में एक शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि दर्री क्षेत्र में संचालित एक निजी इंजीनियरिंग प्रतिष्ठान ने सिंचाई विभाग की बेशकीमती भूमि पर अवैध कब्जा कर लिया है। इतना ही नहीं, प्रतिष्ठान द्वारा सरकारी बाउंड्री वॉल को क्षतिग्रस्त कर उस भूमि का व्यावसायिक उपयोग भी शुरू कर दिया गया।

जांच में पुष्टि: अवैध कब्जा और अर्थदंड का आदेश

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,शिकायत की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन के निर्देश पर राजस्व विभाग की टीम ने स्थल निरीक्षण किया। जांच के दौरान तैयार किए गए पंचनामा और प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से यह तथ्य सामने आया कि संबंधित खसरा नंबर की भूमि के एक हिस्से पर अतिक्रमण किया गया है।

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,इस रिपोर्ट के आधार पर तहसील कार्यालय ने संबंधित प्रतिष्ठान के खिलाफ बेदखली का आदेश जारी किया और नियमों के तहत अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया। प्रशासनिक नियमों के अनुसार, ऐसे मामलों में तत्काल अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी।

आदेश के बाद भी कार्रवाई ठप, व्यावसायिक गतिविधियां जारी

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,स्थानीय लोगों के बीच यह मामला अब चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आरोप है कि बेदखली आदेश जारी हुए काफी समय बीत चुका है, लेकिन मौके पर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। निजी प्रतिष्ठान में व्यावसायिक गतिविधियां पहले की तरह ही बेखौफ संचालित हो रही हैं।

सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि इस देरी के पीछे कुछ ‘अदृश्य’ कारण या प्रशासनिक शिथिलता हो सकती है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कार्रवाई में देरी ने पारदर्शी जांच की मांग को और तेज कर दिया है।

भेदभावपूर्ण कार्रवाई का लग रहा आरोप

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,इस घटनाक्रम ने एक नई बहस को जन्म दिया है। अक्सर देखा जाता है कि छोटे स्तर के अतिक्रमणकारियों या गरीब तबके के कब्जों पर प्रशासन का बुलडोजर तुरंत चल जाता है, लेकिन रसूखदार प्रतिष्ठानों के खिलाफ आदेश होने के बाद भी चुप्पी साध ली जाती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन के इस दोहरे मापदंड से कानून के प्रति आम जनता का भरोसा कम हो सकता है।

आगे क्या? प्रशासन के अगले कदम पर टिकी निगाहें

अब सवाल यह उठता है कि क्या जिला प्रशासन अपने ही आदेश का पालन कराने में सक्षम साबित होगा? क्या सिंचाई विभाग की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया जाएगा या यह मामला फाइलों की धूल फांकता रहेगा?

कागजों में सिमटा बेदखली आदेश,कोरबा की जनता अब इस मामले में ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नियम और कानून सभी के लिए समान हैं।

Pooja Chandrakar

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