इलेक्ट्रिशियन का काम, लेकिन पहचान गुरु की: 15 साल से गरीब बच्चों को दे रहे नि:शुल्क शिक्षा

राजनांदगांव के दीपेश यादव पेशे से इलेक्ट्रिशियन हैं, लेकिन 2008-09 से घर पर ही गरीब बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहे हैं। आज करीब 40 बच्चे यहां पढ़ाई कर रहे हैं।
घर की छत बनी पाठशाला, बिना किसी संस्था के मदद के चल रहा अभियान
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के चिखली वार्ड-5 में रहने वाले दीपेश यादव की कहानी यह साबित करती है कि किसी बड़े काम के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बस नीयत साफ होनी चाहिए। पेशे से इलेक्ट्रिशियन दीपेश पिछले करीब 15 साल से अपने घर को ही एक नि:शुल्क पाठशाला में बदल चुके हैं।

यह सिलसिला साल 2008-09 में शुरू हुआ था, जब वे खुद 12वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे। उस समय आसपास के छोटे बच्चे उनसे गणित के सवाल समझने आते थे। धीरे-धीरे यह छोटी-सी मदद एक नियमित कोचिंग का रूप ले चुकी है, जहां आज पहली से लेकर 12वीं कक्षा तक करीब 40 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
खास बात यह है कि इस पूरे काम के लिए दीपेश को किसी सरकारी या निजी संस्था से नियमित आर्थिक मदद नहीं मिलती। वे इलेक्ट्रिशियन के काम से होने वाली कमाई से ही अपने परिवार का खर्च चलाते हैं और उसी में से बच्चों की जरूरतें भी पूरी करते हैं।

गणित के सवालों से शुरुआत, अब हर विषय में मार्गदर्शन
दीपेश खुद गणित के विद्यार्थी रहे हैं, इसलिए शुरुआत में बच्चे उनसे इसी विषय की मदद लेने आते थे। समय के साथ बच्चों की संख्या और भरोसा दोनों बढ़ते गए।
- शुरुआत में केवल कुछ बच्चे सवाल पूछने आते थे
- अब पहली से 12वीं तक करीब 40 बच्चे नियमित पढ़ते हैं
- स्कूली पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराई जाती है
आज भी दीपेश दिन में इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं और उसके बाद समय निकालकर बच्चों को पढ़ाते हैं। यह उनके लिए अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

किताबें, कॉपी और पेन भी खुद उपलब्ध कराते हैं
दीपेश केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रहते। वे समय-समय पर बच्चों को किताबें, कॉपी, पेन और अन्य जरूरी पढ़ाई सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं, ताकि पैसों की कमी किसी बच्चे की पढ़ाई में रुकावट न बने।
उनका कहना है कि उनके पास आने वाले कई बच्चों में अच्छी प्रतिभा है, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से वे कोचिंग या अतिरिक्त पढ़ाई सामग्री से वंचित रह जाते हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने तय किया कि अपनी सीमित आमदनी में से भी वे बच्चों की मदद करते रहेंगे।
पत्नी और साथियों का भी मिल रहा सहयोग
इस पूरी पहल में दीपेश अकेले नहीं हैं। उनकी पत्नी बबीता यादव पहली से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को पढ़ाने में मदद करती हैं। इसके अलावा वे बच्चियों को सिलाई जैसे हुनर भी सिखाती हैं, ताकि शिक्षा के साथ-साथ उन्हें आगे काम आने वाला कोई कौशल भी मिल सके।
पीएससी की तैयारी कर रहे स्नेहा वर्मा और जयप्रकाश वर्मा भी इस काम में सहयोग दे रहे हैं। दोनों अपनी परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाने के लिए भी समय निकालते हैं, जिससे विद्यार्थियों को अलग-अलग विषयों में बेहतर मार्गदर्शन मिल रहा है।
क्या है इस पहल की खास बात?
- बिना किसी संस्थागत सहयोग के 15 साल से लगातार चल रही है यह कोशिश
- स्कूली शिक्षा के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराई जाती है
- परिवार के सदस्य और साथी मिलकर बच्चों की मदद कर रहे हैं
- पढ़ाई सामग्री भी नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाती है
दीपेश यादव की यह कहानी दिखाती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े पैसे या बड़े मंच की जरूरत नहीं होती। घर से शुरू किया गया एक छोटा-सा प्रयास भी कई बच्चों के भविष्य को नई दिशा दे सकता है।









