Real Life Inspiring Story: अनाथ आश्रम से नीदरलैंड्स के ‘मेयर’ तक! 40 साल बाद “मां” की तलाश में भारत लौटा यह शख्स, कहानी है बिल्कुल फिल्मी

Real Life Inspiring Story: कहते हैं कि कुदरत की लेखनी इंसान की सोच से कहीं ऊपर होती है। आज हम आपको एक ऐसी सच्ची घटना बताने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे और आप भी कह उठेंगे—”किस्मत हो तो ऐसी!” यह कहानी नागपुर के एक ऐसे बच्चे की है, जिसे 4 दिन की उम्र में उसकी मां ने अनाथ आश्रम (Orphanage) की सीढ़ियों पर छोड़ दिया था। लेकिन आज वही बच्चा सात समंदर पार नीदरलैंड्स (Netherlands) का मेयर बनकर अपनी जन्म देने वाली मां को ढूंढने भारत लौटा है।
आइए जानते हैं फाल्गुन बिन्नेन्डिज्क (Falgun Binnendijk) के इस अविश्वसनीय सफर के बारे में।
🏥 1985: नागपुर के एक अनाथ आश्रम से शुरू हुई दास्तां
Real Life Inspiring Story: यह भावुक कर देने वाली कहानी साल 1985 में शुरू हुई थी। नागपुर में एक 21 वर्षीय अविवाहित मां (Unmarried Mother) ने सामाजिक व्यवस्था और बदनामी के डर से अपने 4 दिन के मासूम बच्चे को एक अनाथालय में छोड़ दिया। करीब एक महीने तक उस बच्चे की देखभाल आश्रम में हुई।
Real Life Inspiring Story: उसी दौरान नीदरलैंड्स से एक जोड़ा (Dutch Couple) भारत घूमने आया था। उन्हें उस बच्चे से ऐसा लगाव हुआ कि उन्होंने उसे गोद (Adopt) ले लिया और अपने साथ नीदरलैंड्स ले गए।
🇳🇱 ‘हीमस्टेड’ शहर के मेयर बने फाल्गुन
Real Life Inspiring Story: वही बच्चा जिसे कभी अपनों ने ठुकरा दिया था, आज नीदरलैंड्स की राजधानी एम्सटर्डम के पास स्थित खूबसूरत शहर ‘हीमस्टेड’ (Heemstede) के मेयर हैं। फाल्गुन ने अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर यह ऊंचा मुकाम हासिल किया है। लेकिन मेयर की कुर्सी तक पहुंचने के बाद भी उनका मन हमेशा अपनी ‘जड़ों’ और अपनी ‘मां’ को खोजने के लिए बेचैन रहा।
🌸 ‘फाल्गुन’ नाम के पीछे की दिलचस्प वजह
Real Life Inspiring Story: नीदरलैंड्स में रहने के बावजूद उनका नाम इतना भारतीय क्यों है? इसके पीछे एक बेहद खूबसूरत वजह है। जब वह बच्चा आश्रम में था, तब एक नर्स ने उसका नाम ‘फाल्गुन’ रखा था, क्योंकि उसका जन्म फाल्गुन के महीने में हुआ था। नीदरलैंड्स के उस दंपति ने उसका यह नाम नहीं बदला और उसे हमेशा ‘फाल्गुन’ ही बुलाते रहे।
📖 महाभारत से मिली ‘मां’ को ढूंढने की प्रेरणा
Real Life Inspiring Story: मेयर फाल्गुन बिन्नेन्डिज्क ने बताया कि उन्होंने महाभारत पढ़ी है और वहीं से उन्हें प्रेरणा मिली कि “हर ‘कर्ण’ को अपनी ‘कुंती’ (मां) से मिलने का पूरा अधिकार है।” इसी वजह से वह अब तक 3 बार भारत आ चुके हैं ताकि अपनी मां से मिल सकें।
🔍 40 साल बाद मां की तलाश और अधूरा सपना
Real Life Inspiring Story: अपनी मां को ढूंढने के लिए फाल्गुन ने नागपुर नगर निगम की मदद ली। नगर निगम आयुक्त अभिजीत चौधरी ने जब पुराने दस्तावेज निकलवाए, तो कई अहम खुलासे हुए:
उनकी मां उस समय महज 21 साल की थीं और समाज के डर से उन्होंने यह कठिन फैसला लिया था।
दस्तावेजों में उनकी मां का नाम दर्ज है, लेकिन फाल्गुन ने अपनी मां की प्राइवेसी (निजता) का सम्मान करते हुए उनका नाम सार्वजनिक नहीं किया है।
फाल्गुन का मानना है कि उनकी मां भी उनसे मिलने के लिए उतनी ही बेताब होंगी, जितना कि वह खुद हैं।
फाल्गुन का भावुक संदेश: “मैं अपनी मां से मिलकर बस यह बताना चाहता हूं कि उनका बेटा आज किस मुकाम पर है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है, बस एक बार उनसे मिलना मेरा जीवन का सबसे बड़ा सपना है।”















