छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड! डॉक्टरों की मेहरबानी पर उठे गंभीर सवाल
नियम ताक पर रखकर हाई प्रोफाइल कैदियों को एक महीने से ज्यादा समय तक किया गया भर्ती; मेडिकल बोर्ड की भूमिका भी संदिग्ध

रायपुर : छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड! डॉक्टरों की मेहरबानी पर उठे गंभीर सवाल. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां मनोरोग विभाग कथित तौर पर हाई प्रोफाइल कैदियों के लिए ‘VIP रेस्ट हाउस’ में तब्दील हो गया है। डॉक्टरों की ‘मेहरबानी’ के चलते कई रसूखदार कैदियों को एक महीने से भी अधिक समय तक साइकेट्री विभाग में भर्ती कर उनका मानसिक इलाज किया गया, जबकि अस्पताल के नियमों के अनुसार किसी कैदी को इतने लंबे समय तक भर्ती नहीं रखा जा सकता। इस मामले ने चिकित्सा प्रणाली और मेडिकल बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अधिकारियों के अनुसार, रावतपुरा सरकार निजी मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर अतुल तिवारी और गीतांजलि यूनिवर्सिटी उदयपुर (राजस्थान) के रजिस्ट्रार मयूर रावल जैसे हाई प्रोफाइल कैदी दो महीने से ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहे। वहीं, रीएजेंट घोटाले के आरोपी शशांक चोपड़ा ने भी 5 दिनों तक अस्पताल में इलाज करवाया। चौंकाने वाली बात यह है कि ये आरोपी मेडिसिन विभाग में भी 10 दिनों तक भर्ती रहे और कुल 65 दिनों तक एक से दूसरे वार्ड में ‘बीमारी के बहाने’ शिफ्ट होते रहे। आरोप यह भी है कि प्रबंधन को पैसे देकर मैनेज करने का प्रयास किया गया।छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड!
विशेषज्ञ डॉक्टरों का मानना है कि डिप्रेशन और आत्महत्या के विचारों वाले मरीजों को आमतौर पर भर्ती नहीं किया जाता, बल्कि दवाइयों से उनका इलाज किया जाता है। लेकिन साइकेट्री विभाग ने सभी नियमों को दरकिनार करते हुए इन कैदियों को एक माह से अधिक समय तक भर्ती रखा।छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड!
जांच में यह भी सामने आया है कि साइकेट्री विभाग ने न तो अस्पताल अधीक्षक कार्यालय को और न ही जिला मेडिकल बोर्ड को इसकी जानकारी दी। नियमों के तहत 10 दिनों से अधिक भर्ती रखने के लिए जिला मेडिकल बोर्ड और एक माह से अधिक के लिए राज्य मेडिकल बोर्ड की अनुमति आवश्यक होती है। बोर्ड ही तय करता है कि कैदियों को आगे इलाज के लिए भर्ती किया जाना है या नहीं।छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड!
मेडिकल बोर्ड पर भी सवाल:
पत्रिका की पड़ताल में यह भी खुलासा हुआ है कि जिन मामलों में मेडिकल बोर्ड को सूचना दी जाती है, वहां भी बैठकें जानबूझकर टाली जाती हैं। जानकारों का कहना है कि यह कैदियों का इलाज चलता रहे, इसके लिए बोर्ड और डॉक्टरों की मिलीभगत होती है। रिपोर्ट में भी हेरफेर किया जाता है ताकि कैदियों को बीमार बताया जा सके और जांच होने पर कोई फंसे नहीं।छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड!
पूर्व में भी ऐसे मामले:
एक अन्य मामले में, इनकम टैक्स कमिश्नर के बेटे को 31 दिनों तक साइकेट्री विभाग में भर्ती रखा गया, जबकि उन्हें केवल तीन दिनों तक भर्ती रखा जाना था। शराब घोटाले का आरोपी अनवर ढेबर और कोल घोटाले का आरोपी संजय अग्रवाल भी लंबे समय तक आईसीयू और प्राइवेट वार्ड में भर्ती रहे। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब कैदियों के इलाज को लेकर डॉक्टर निशाने पर आए हैं, लेकिन इस बार का मामला विशेष रूप से सुर्खियों में है। इस घटना ने चिकित्सा नैतिकता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।छत्तीसगढ़ में ‘VIP’ कैदियों का ‘रेस्ट हाउस’ बना मनोरोग वार्ड!









