Sholay turns 50: असली ‘जय-वीरू’ और ‘हरिराम नाई’ का इंदौर से है ये गहरा नाता, जानकर चौंक जाएंगे आप! भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘शोले’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक भावना है। हाल ही में इस कालजयी फिल्म ने अपनी रिलीज के 50 साल पूरे कर लिए हैं। इस खास मौके पर ‘शोले रिटर्न्स’ के रूप में इसे एक बार फिर बड़े पर्दे पर उतारा गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गब्बर, जय और वीरू जैसे किरदारों को जन्म देने वाली इस कहानी की जड़ें मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से जुड़ी हैं?
आज हम आपको फिल्म शोले के उन अनसुने पहलुओं के बारे में बताएंगे, जो शायद ही किसी को पता हों।
सलीम खान के स्कूल के दोस्त थे असली ‘जय-वीरू’
Sholay turns 50: फिल्म में अमिताभ बच्चन (जय) और धर्मेंद्र (वीरू) की दोस्ती की मिसाल आज भी दी जाती है। लेकिन ये नाम काल्पनिक नहीं थे। फिल्म के मशहूर लेखक सलीम खान ने ये नाम अपने स्कूल के दो जिगरी दोस्तों जय सिंह और वीरेंद्र बायस के सम्मान में रखे थे। इंदौर में बिताए अपने बचपन की यादों को सलीम खान ने इन अमर किरदारों के जरिए सुनहरे पर्दे पर उतारा।
कौन थे ‘हरिराम नाई’ और क्या है उनका इंदौर कनेक्शन?
Sholay turns 50: फिल्म का वह सीन तो आपको याद ही होगा, जिसमें अभिनेता केस्टो मुखर्जी जेल में कैदियों की शेविंग करते हुए जासूसी करते हैं। उस किरदार का नाम ‘हरिराम’ था। असल जिंदगी में हरिराम इंदौर के पलासिया क्षेत्र में एक हेयर कटिंग सैलून चलाते थे।
Sholay turns 50: सलीम खान जब भी इंदौर आते थे, वे हरिराम की दुकान पर ही बाल कटवाने और शेविंग कराने जाते थे। हरिराम का अंदाज सलीम खान को इतना पसंद आया कि उन्होंने फिल्म के एक किरदार का नाम ही उनके नाम पर रख दिया।
सैलून की उसी ‘गुमटी’ में लिखी गई थी शोले की पटकथा
Sholay turns 50: हैरान कर देने वाली बात यह है कि सलीम खान-जावेद अख्तर की जोड़ी ने ‘शोले’ की स्क्रिप्ट का एक बड़ा हिस्सा इंदौर के उसी मामूली सैलून में बैठकर लिखा था। सलीम खान वहां घंटों बैठते थे और वहीं से फिल्म के छोटे-बडे़ किरदारों और संवादों को आकार मिला।
Sholay turns 50: सलीम खान ने असली हरिराम को मुंबई आकर फिल्म में काम करने का ऑफर भी दिया था, लेकिन अपनी दुकान के प्रति वफादारी के कारण हरिराम ने मना कर दिया। हालांकि, उन्होंने अपना नाम इस्तेमाल करने की सहर्ष अनुमति दे दी थी।
आज भी जीवित है विरासत: तीसरी पीढ़ी संभाल रही है काम
Sholay turns 50: इंदौर के असली हरिराम अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत आज भी कायम है। पलासिया की वह पुरानी दुकान समय के साथ भले ही बदल गई हो, लेकिन उनके बेटे नेमीचंद आमेरिया और पोते प्रदीप आज भी इंदौर के पलासिया और महालक्ष्मी नगर में सैलून चला रहे हैं। वे आज भी गर्व से बताते हैं कि कैसे उनके दादा की सादगी ने भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म में अपनी जगह बनाई।
‘शोले’ और इंदौर का अटूट रिश्ता
Sholay turns 50: सलीम खान समय-समय पर इंदौर आते रहते हैं और पुरानी यादों को ताजा करते हैं। यह इंदौर के लिए गर्व की बात है कि बॉलीवुड की सबसे प्रतिष्ठित फिल्म के आधार स्तंभ इसी शहर की गलियों से निकले हैं। 50 साल बाद भी जब सिनेमाघरों में ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गूंजता है, तो इंदौर की उन गलियों की याद ताजा हो जाती है जहां जय, वीरू और हरिराम जैसे किरदारों की नींव रखी गई थी।