भिलाई-जामुल एनकाउंटर: जब औद्योगिक शहर में गूंजी थीं गोलियां, ऐसे हुआ था ‘अर्बन नक्सल’ नेटवर्क का अंत

भिलाई-जामुल एनकाउंटर:नक्सलवाद की जड़ें केवल घने जंगलों तक ही सीमित नहीं रही हैं, बल्कि एक समय में इन्होंने छत्तीसगढ़ के शांत और औद्योगिक शहरों में भी अपना जाल बिछा लिया था। ‘अर्बन नक्सल’ यानी शहरों में रहकर नक्सली विचारधारा को हवा देने वाले नेटवर्क को ध्वस्त करना पुलिस के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। साल 2010 में दुर्ग पुलिस ने एक ऐसी ही साहसिक कार्रवाई की थी, जिसने नक्सलियों के शहरी तंत्र की कमर तोड़ दी थी।
भिलाई की विविधता का नक्सलियों ने उठाया था फायदा
भिलाई एक ऐसा शहर है जहाँ मिनी भारत की झलक मिलती है। यहाँ झारखंड, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सहित देश के कोने-कोने से लोग आकर बसते हैं। इसी विविधता और बाहरी लोगों की भारी आबादी का फायदा उठाकर नक्सलियों ने भिलाई और आसपास के इलाकों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया था। नए चेहरों के बीच नक्सलियों की पहचान करना पुलिस के लिए बेहद मुश्किल काम था, लेकिन मुखबिरों के सटीक जाल ने इस नामुमकिन काम को मुमकिन कर दिखाया।
खुफिया सूचना और पुलिस की गुप्त रणनीति
तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (DGP) विश्वरंजन के मार्गदर्शन में पुलिस को एक पुख्ता इनपुट मिला। खबर थी कि उत्तर बस्तर मांढ डिवीजनल कमेटी का सक्रिय सदस्य और इनामी नक्सली ‘चिनागेश’ अपनी साथी महिला नक्सली तारा बाई के साथ जामुल इलाके में छिपा हुआ है।
इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए तत्कालीन आईजी आर.के. विज और एसपी अमित कुमार ने एक गोपनीय योजना तैयार की। एएसपी एमएल कोटवानी और एएसपी ग्रामीण मनीष शर्मा के नेतृत्व में चार विशेष टीमें बनाई गईं। पूरी रणनीति को इतना गुप्त रखा गया कि विभाग के अन्य लोगों को भी इसकी भनक नहीं लगी।
आधी रात को बोगदा पुलिया पर खूनी संघर्ष
तारीख थी जब रात के करीब 1:30 बज रहे थे। जामुल की बोगदा पुलिया के पास सन्नाटा पसरा था, तभी 17 सदस्यीय पुलिस टीम ने घेराबंदी शुरू की। झाड़ियों में छिपे नक्सलियों ने खुद को घिरा देख पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। नक्सलियों की ओर से करीब 8 राउंड गोलियां चलीं।
भिलाई-जामुल एनकाउंटर:जवाब में पुलिस ने भी मोर्चा संभाला और आत्मरक्षा में 14 राउंड जवाबी फायरिंग की। इस मुठभेड़ में इनामी नक्सली नागेश के पेट और छाती में गोलियां लगीं, जबकि महिला नक्सली तारा बाई भी गंभीर रूप से घायल होकर वहीं ढेर हो गई। गोलियों की आवाज से पूरा जामुल और हाउसिंग बोर्ड इलाका दहल उठा था।
शिनाख्त के लिए बुलाया गया था विशेष SPO
भिलाई-जामुल एनकाउंटर:मुठभेड़ के बाद मारे गए नक्सली की पहचान को लेकर संशय था। डायरी के आधार पर उसे ‘नागेश’ माना जा रहा था, लेकिन पुख्ता पहचान के लिए कोयलीबेड़ा से एक विशेष एसपीओ (SPO) को बुलाया गया। उस एसपीओ ने पुष्टि की कि मृत नक्सली नागेश ही है, जो उत्तर बस्तर डिवीजन का खूंखार सदस्य था और उस पर 2 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
तलाशी में मिला हथियारों और नकदी का जखीरा
घटनास्थल की तलाशी के दौरान पुलिस को भारी मात्रा में आपत्तिजनक सामान और हथियार मिले:
हथियार: एक 9mm की पिस्टल और एक 0.32mm की पिस्टल, साथ ही जिंदा कारतूस।
नकदी: नागेश के पास से 49,000 रुपये नकद बरामद हुए।
दस्तावेज: नक्सलियों की निजी और इलेक्ट्रॉनिक डायरी, जिससे शहरी नेटवर्क के कई अहम सुराग मिले।
अन्य सामग्री: वाकी-टाकी, कंपास, दवाइयां और दैनिक उपयोग की वस्तुएं जैसे चाय पत्ती, शक्कर और बिस्कुट।
अर्बन नेटवर्क पर पुलिस का कड़ा प्रहार
भिलाई-जामुल एनकाउंटर:2010 का यह एनकाउंटर केवल दो नक्सलियों का अंत नहीं था, बल्कि यह उन ताकतों के लिए एक चेतावनी थी जो शहरों में बैठकर देश विरोधी साजिशें रच रहे थे। भिलाई-जामुल की इस कार्रवाई ने यह सिद्ध कर दिया कि पुलिस की चौकसी के आगे नक्सलियों का शहरी नेटवर्क कभी सुरक्षित नहीं रह सकता।



















