बस्तर दशहरा 2026: मुरिया दरबार में राष्ट्रपति की प्रस्तावित मौजूदगी, तैयारी तेज

23 अक्टूबर को जगदलपुर में होने वाले मुरिया दरबार के लिए प्रशासन ने तैयारियां तेज कीं। जानिए बस्तर दशहरा की रस्में, इतिहास और राष्ट्रपति के प्रस्तावित कार्यक्रम की जानकारी।
जगदलपुर। बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार की तैयारियां तेज हो गई हैं। 23 अक्टूबर को होने वाले इस आयोजन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता को देखते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर जाकर व्यवस्थाएं परखीं।

कमिश्नर डोमन सिंह, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने माँ दंतेश्वरी मंदिर, सिरहासार भवन और लालबाग मैदान का निरीक्षण किया। मंच, बैरिकेडिंग, सुरक्षा, यातायात और जनसुविधाओं के काम समय पर पूरे करने के निर्देश दिए गए।
राष्ट्रपति का दौरा अभी “प्रस्तावित” बताया गया है। अंतिम कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।

अधिकारियों ने किन जगहों का जायजा लिया?
- माँ दंतेश्वरी मंदिर: श्रद्धालुओं की आवाजाही और दर्शन व्यवस्था।
- सिरहासार भवन: यहीं पारंपरिक मुरिया दरबार होता है। बैठक व्यवस्था की समीक्षा हुई।
- लालबाग मैदान: यहां प्रस्तावित आमसभा और बस्तर की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित प्रदर्शनी की तैयारियां देखी गईं।
प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा के साथ आम नागरिकों और श्रद्धालुओं की सुविधा को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
क्या है मुरिया दरबार?
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की सबसे अलग पहचान वाली रस्मों में गिना जाता है। इसमें बस्तर के गांवों और समुदायों के प्रतिनिधि एक मंच पर आते हैं।

- इसकी शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई मानी जाती है। तब सिरोंचा के डिप्टी कमिश्नर ने मांझी-चालकियों को संबोधित किया था। बाद में इसे बस्तर दशहरा का हिस्सा बना दिया गया।
- आज के दौर में संभाग के निर्वाचित जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिकारी इसमें शामिल होते हैं। वे ग्रामीणों से आवेदन और समस्याएं सुनते हैं।
- 2024 के दरबार में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने माडिया साराय में विकास कार्यों के लिए 50 लाख रुपये देने की घोषणा की थी। उन्होंने मांझी, चालकी और मेम्बर-मेंबरीन के मानदेय में बढ़ोतरी का प्रस्ताव बनाने के निर्देश भी दिए थे।
यानी यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन के बीच संवाद का मंच भी है।
75 दिनों का पर्व: कौन-कौन सी रस्में होती हैं?
बस्तर दशहरा करीब 75 दिन चलता है। इसकी शुरुआत हरेली अमावस्या पर पाट जात्रा से होती है, जिसमें पवित्र लकड़ी और रथ निर्माण के औजारों की पूजा की जाती है। इसके बाद ये प्रमुख रस्में होती हैं:
- काछिनगादी: काछिन देवी की आराधना कर पर्व और रथ संचालन की पारंपरिक अनुमति ली जाती है।
- जोगी बिठाई: उत्सव के निर्विघ्न पूरा होने की कामना से की जाने वाली साधना।
- रथ परिक्रमा: विशाल लकड़ी का रथ ग्रामीण और श्रद्धालु मिलकर खींचते हैं।
- मावली परघाव: दंतेवाड़ा से आने वाली माँ दंतेश्वरी की डोली का स्वागत।
- निशा जात्रा: रात में होने वाला देवी आराधना का अनुष्ठान।
- मुरिया दरबार: जनसंवाद और सामुदायिक भागीदारी की परंपरा।
रावण दहन के बिना दशहरा
देश के अधिकांश हिस्सों से अलग, बस्तर दशहरा में रावण दहन नहीं होता। यहां पूजा के केंद्र में माँ दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवता और ग्राम देवता हैं। मान्यता है कि इस परंपरा को राजा पुरुषोत्तम देव के समय विशेष विस्तार मिला। धीरे-धीरे यह राजपरिवार से निकलकर पूरे अंचल की साझा आस्था बन गया।
राष्ट्रपति की रुचि पहले भी सामने आई थी
जुलाई 2026 में बस्तर पंडुम के विजेताओं और 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का राष्ट्रपति भवन में सम्मान हुआ था। उस दौरान मुख्यमंत्री के आग्रह पर राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में शामिल होने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा था कि बस्तर दशहरा उनके हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर असर
बड़े आयोजन और राष्ट्रीय ध्यान का असर स्थानीय बाजार पर भी पड़ता है। जगदलपुर में बस्तर दशहरा पसरा जैसी सुविधाएं स्थानीय कारोबार और सांस्कृतिक गतिविधियों को मंच देती हैं। डोकरा शिल्प, टेराकोटा और काष्ठ शिल्प जैसी बस्तर की कलाओं को खरीदार और पर्यटक मिलने से कारीगरों की आजीविका को सहारा मिल सकता है। परिवहन, आवास और खानपान से जुड़े लोगों को भी अवसर बढ़ने की उम्मीद रहती है।
आगे क्या?
- 23 अक्टूबर को सिरहासार भवन में मुरिया दरबार होगा।
- लालबाग मैदान में आमसभा और प्रदर्शनी प्रस्तावित है।
- राष्ट्रपति के कार्यक्रम का अंतिम ब्योरा आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।









