भखारा नगर पंचायत विवाद: 9 साल, दर-दर की ठोकरें और अधूरा इंसाफ; आखिर मंजू को क्यों नहीं मिला घर?

भखारा नगर पंचायत विवाद:छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के अंतर्गत आने वाले नगर पंचायत भखारा से प्रशासनिक लापरवाही का एक ऐसा मामला सामने आया है, जो व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यह कहानी मंजू बांधे की है, जो पिछले 9 वर्षों से न्याय की गुहार लगा रही हैं, लेकिन उनकी फाइलें दफ्तरों के धूल फांक रही हैं।
2017 की वो घटना: जब बिना सूचना ढहा दिया गया आशियाना
भखारा नगर पंचायत विवाद:पीड़िता मंजू बांधे के अनुसार, यह विवाद 5 मई 2017 को शुरू हुआ था। उस दौरान नगर पंचायत ने अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया था। मंजू का आरोप है कि जब वह शहर से बाहर थीं, तब बिना किसी पूर्व नोटिस (Prior Notice) के उनके घर को जमींदोज कर दिया गया।
भखारा नगर पंचायत विवाद:इतना ही नहीं, घर के अंदर रखा सारा कीमती सामान जब्त कर बस स्टैंड पर रखवा दिया गया, जहां से वह चोरी हो गया। इस कार्रवाई ने परिवार को न केवल बेघर किया, बल्कि उन्हें भारी आर्थिक चोट भी पहुंचाई।
पुनर्वास प्रक्रिया (Rehabilitation) पर भेदभाव के आरोप
भखारा नगर पंचायत की इस कार्रवाई के दौरान कुल 77 परिवारों के घर तोड़े गए थे। प्रशासन का दावा है कि उन्होंने 76 परिवारों को दूसरी जगह जमीन आवंटित कर दी है। लेकिन मंजू बांधे का परिवार आज भी खाली हाथ है।
पीड़िता ने व्यवस्था पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए हैं:
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अपात्रों को लाभ: मंजू का दावा है कि कई ऐसे लोगों को प्लॉट दिए गए जिनके पास केवल अस्थायी कब्जा था।
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नियमों की अनदेखी: मंजू का नाम 2011 की जनगणना सूची में शामिल है और वह नियमित रूप से टैक्स का भुगतान भी करती रही हैं, फिर भी उन्हें ‘पात्र’ नहीं माना गया।
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पक्षपात: कुछ रसूखदार परिवारों को एक से अधिक प्लॉट आवंटित करने के भी आरोप लगे हैं।
“जब तक हक नहीं मिलेगा, लड़ाई जारी रहेगी”
भखारा नगर पंचायत विवाद:अपने छोटे बच्चों के साथ कलेक्टर कार्यालय और तहसील के चक्कर काट रही मंजू का दर्द अब आक्रोश में बदल चुका है। उनका कहना है कि जिस जमीन पर उनका घर था, वहां अब आलीशान व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बन चुका है। वह कहती हैं, “मैं 9 साल से भटक रही हूँ, लेकिन जब तक मुझे मेरा हक नहीं मिलता, मैं पीछे नहीं हटूंगी।”
खामोश प्रशासन और फाइलों में दबा न्याय
हैरानी की बात यह है कि इतने वर्षों बाद भी नगर पंचायत के अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के पास इस मामले पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। पीड़िता ने कई बार जरूरी दस्तावेज पेश किए, लेकिन हर बार मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
यह मामला केवल एक महिला के संघर्ष का नहीं है, बल्कि यह उन सभी परिवारों की आवाज है जो प्रशासनिक विसंगतियों के कारण अपने ही अधिकारों से वंचित रह जाते हैं।
भखारा नगर पंचायत विवाद:छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन द्वारा पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन मंजू बांधे का यह मामला धरातल की हकीकत को बयां कर रहा है। अब देखना यह होगा कि धमतरी प्रशासन इस ओर ध्यान देता है या यह संघर्ष 10वें साल में भी इसी तरह जारी रहेगा।









