एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?

बिना अनुमति कटे नीलगिरी के पेड़, एसईसीएल और वन विभाग पर उठे सवाल
बैकुंठपुर/कटकोना: क्या एसईसीएल ने तालाब चौड़ीकरण के नाम पर नियमों को ताक पर रख दिया? क्या बिना किसी अनुमति के ही नीलगिरी के पेड़ों की कटाई की जा रही है? इन सवालों ने कोरिया जिले के कटकोना क्षेत्र में हलचल मचा दी है। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
तालाब चौड़ीकरण बना अवैध कटाई की वजह
कटकोना में स्थित एक तालाब का गहरीकरण और चौड़ीकरण करने की योजना बनाई गई थी, जिसके लिए निविदा भी जारी कर दी गई थी। हालांकि, इस प्रक्रिया में नीलगिरी के पेड़ों को कटने से बचाने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया। नतीजा यह हुआ कि लकड़ी माफियाओं ने करीब 50 से अधिक नीलगिरी के पेड़ों को काट डाला। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
पेड़ कटाई की जानकारी न एसईसीएल प्रबंधन को, न ठेकेदार को
हैरानी की बात यह है कि इस पेड़ कटाई की न तो सहक्षेत्रीय प्रबंधक को जानकारी थी, न ही महाप्रबंधक को। ठेकेदार, जिसे तालाब का कार्य सौंपा गया था, वह भी असमंजस में है कि पेड़ काटे बिना काम कैसे शुरू करे। उसने सुरक्षा निधि भी जमा कर दी है, लेकिन उसे काम करने की अनुमति नहीं मिल रही। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
क्या वन विभाग ने दी थी अनुमति?
जानकारों की मानें तो वन विभाग की अनुमति के बिना नीलगिरी के पेड़ नहीं काटे जा सकते, क्योंकि यह क्षेत्र एसईसीएल के लीज़ पर है लेकिन स्वामित्व वन विभाग का है। अब सवाल यह उठता है कि क्या एसईसीएल ने वन विभाग से कोई अनुमति ली थी? यदि नहीं, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में पेड़ कैसे कट गए? एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
2 करोड़ की लागत से हो रहा तालाब चौड़ीकरण, ठेकेदार की रकम फंसी
एसईसीएल ने तालाब चौड़ीकरण के लिए 2 करोड़ रुपये का टेंडर निकाला था, लेकिन यह टेंडर 50% कम लागत पर 1 करोड़ में फाइनल हुआ। टेंडर को मिले 3 महीने बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक कार्य शुरू नहीं हुआ। ऐसे में ठेकेदार की 1 करोड़ रुपये की राशि एसईसीएल के पास फंसी हुई है। सवाल यह भी है कि क्या एसईसीएल इस राशि को ब्याज सहित वापस करेगा? एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
तालाब चौड़ीकरण की जरूरत क्यों पड़ी?
यह तालाब 45 साल पुराना है और अब तक जस का तस बना हुआ था। एसईसीएल हर साल गोबरी जलाशय से पानी लेने के लिए जल संसाधन विभाग को 15 लाख रुपये देता रहा है। ऐसे में तालाब को गहरा करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? क्या इसके पीछे कोई और कारण है? एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
बिना वन विभाग की अनुमति कैसे हुआ टेंडर?
यदि तालाब का चौड़ीकरण वन क्षेत्र में हो रहा है, तो इसके लिए वन विभाग से अनुमति लेना अनिवार्य था। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह अनुमति ली गई थी या नहीं। इस पूरे मामले में वन विभाग की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
पहले भी काटे जा चुके हैं पेड़
यह पहला मामला नहीं है जब इस क्षेत्र में पेड़ों की कटाई हुई हो। 12 साल पहले भी इसी इलाके में एक नया तालाब बनाया गया था, तब भी सैकड़ों पेड़ काटे गए थे। अब पुराने तालाब को नए तालाब से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है, जिसके लिए फिर से पेड़ काटे जा रहे हैं। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
एसईसीएल की मनमानी और पर्यावरण को खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तालाब को गहरा करना जरूरी था, तो पुराने तालाब की सफाई और विस्तार करके भी यह काम किया जा सकता था। लेकिन एसईसीएल पर्यावरण की अनदेखी कर रही है और नियमों को ताक पर रखकर नए तालाब का निर्माण कर रही है। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
बिना उच्च अधिकारियों की मिलीभगत कैसे कटे पेड़?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना एसईसीएल के उच्च अधिकारियों की जानकारी के 50 से ज्यादा नीलगिरी के पेड़ कैसे कट गए? यह स्पष्ट संकेत देता है कि या तो अधिकारियों की मिलीभगत थी या फिर वे अपनी जिम्मेदारियों से अनजान थे। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?
वन विभाग की चुप्पी पर सवाल
पेड़ों की कटाई के बाद भी वन विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अगर यह अवैध था, तो संबंधित अधिकारियों को तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए थी। लेकिन अब तक कोई ठोस बयान या कदम देखने को नहीं मिला है। एसईसीएल ने नियमों को दरकिनार कर नीलगिरी के पेड़ कटाई की इजाजत दी?



















