सुकमा पुलिस लाइन में पहली बार गरबा-डांडिया, दुर्गा फाइटर्स और शहीद परिवार भी हुए शामिल

सुकमा पुलिस लाइन में एसपी मयंक गुर्जर की पहल पर पहली बार गरबा-डांडिया महोत्सव हुआ। दुर्गा फाइटर्स, पुलिस परिवार और शहीद जवानों के परिजन शामिल हुए।
सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की पुलिस लाइन में पहली बार गरबा-डांडिया महोत्सव का आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम 17 अक्टूबर को पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर की पहल पर हुआ। इसमें पुलिसकर्मी, पुलिस परिवारों की महिलाएं और बच्चे, महिला कमांडो और शहीद जवानों के परिजन शामिल हुए।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तैनात महिला कमांडो और पुलिस की महिला इकाई “दुर्गा फाइटर्स” की जवानों की भागीदारी आयोजन का मुख्य आकर्षण रही। आमतौर पर इन जवानों की पहचान ड्यूटी और अभियानों से जुड़ी रहती है। इस बार वे पारंपरिक धुनों पर डांडिया खेलती नजर आईं।
आयोजन में कौन-कौन पहुंचा?
पुलिस लाइन में हुए इस कार्यक्रम में अधिकारी भी अपने परिवारों के साथ शामिल हुए।

- कलेक्टर अमित कुमार
- सीआरपीएफ के डीआईजी आनंद सिंह
- पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर
- अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रोहित शाह और मनोज तिर्की
- वन विभाग के एसडीओ परख सारडा और रक्षित केंद्र अधिकारी रवि उपाध्याय
दुर्गा फाइटर्स क्यों रहीं चर्चा में?
दुर्गा फाइटर्स सुकमा पुलिस की महिला कमांडो इकाई है, जिसकी महिला जवान नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात रहती हैं। इन जवानों के लिए यह आयोजन रोज की ड्यूटी से हटकर त्योहार का माहौल महसूस करने का मौका बना। परिवारों के बीच वे सहजता से डांडिया में शामिल हुईं।
शहीद जवानों के परिजनों को खास न्योता
आयोजन में शहीद जवानों के परिवारों की महिलाओं और बच्चों को भी बुलाया गया। इससे कार्यक्रम का स्वरूप सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा। यह पुलिस बल और उन परिवारों के जुड़ाव का भी अवसर बना, जिन्होंने अपने सदस्य खोए हैं।

एसपी ने क्यों की यह पहल?
पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर के अनुसार पुलिस बल की ड्यूटी चुनौतीपूर्ण, तनावपूर्ण और जोखिम भरी होती है। ऐसे माहौल में इस तरह के आयोजन जवानों और उनके परिवारों को नई ऊर्जा देते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वर्दी के पीछे एक परिवार और भावनाओं का संसार होता है।
पुलिस परिवारों के लिए और क्या हो रहा है?
सुकमा पुलिस ने हाल ही में पुलिस परिवारों की महिलाओं के लिए “सेवा पथ – एक पहल” भी शुरू की है। इसके तहत पुलिस लाइन परिसर में निःशुल्क सिलाई प्रशिक्षण केंद्र चल रहा है, जहां पहले बैच में 150 महिलाओं को तीन महीने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। गरबा-डांडिया जैसे सांस्कृतिक आयोजन को इसी कल्याण-केंद्रित सोच का हिस्सा माना जा सकता है।
आगे क्या उम्मीद?
यह आयोजन पुलिस लाइन में पहली बार हुआ है। अगले वर्षों में इसे दोहराने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा अभी सामने नहीं आई है।









