छत्तीसगढ़ में पैंक्रियाज कैंसर: देर से पहुंच रहे 90% मरीज, लक्षण पहचानें

छत्तीसगढ़ में हर साल पैंक्रियाज कैंसर के 300 से ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं। ज्यादातर मरीज तीसरी-चौथी स्टेज में पहुंचते हैं। जानें लक्षण और विशेषज्ञों की राय।
छत्तीसगढ़ में पैंक्रियाज (अग्न्याशय) कैंसर के मामले डॉक्टरों की चिंता बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार राज्य में हर साल इसके 300 से ज्यादा नए मरीज सामने आ रहे हैं, जबकि सरकारी और निजी अस्पतालों में हर महीने औसतन 25 से अधिक मरीज पहुंच रहे हैं।

सबसे बड़ी समस्या देर से पहचान की है। बताया गया है कि करीब 90 फीसदी मरीज तीसरी या चौथी स्टेज में इलाज के लिए आते हैं, क्योंकि शुरुआती लक्षणों को लोग गैस या डायबिटीज की समस्या समझकर टाल देते हैं। नवंबर को दुनियाभर में पैंक्रियाटिक कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है और इस वर्ष की थीम “ऑल टूगेदर वी कैन” है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक:

- अप्रैल 2024 से जून 2026 के बीच प्रदेश में कैंसर के कुल 17,611 मरीज दर्ज हुए
- इनमें से 4,253 मामले “अन्य कैंसर” श्रेणी में हैं, जिसमें पैंक्रियाज, लिवर और बाइल डक्ट कैंसर शामिल हैं
- पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से जुड़े रीजनल कैंसर सेंटर में हर साल करीब 3,000 नए कैंसर मरीज पहुंच रहे हैं
- एक निजी कैंसर अस्पताल में 15 महीने में दर्ज 2,296 मामलों में 42 फीसदी ओरल कैंसर के थे, लेकिन गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल कैंसर में तेज बढ़ोतरी देखी गई
राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबकैन 2022 के आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल पैंक्रियाटिक कैंसर के लगभग 13,661 नए मामले और 12,759 मौतें दर्ज होती हैं। यह भारत में 12वां सबसे आम कैंसर है, लेकिन मौतों के लिहाज से चौथे स्थान पर है।
“साइलेंट किलर” क्यों कहा जा रहा है?
पैंक्रियाज कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के और आम पेट की समस्याओं जैसे होते हैं। इसी वजह से जांच में देरी हो जाती है। डॉक्टरों के अनुसार, जब तक बीमारी पकड़ में आती है, तब तक करीब 85 फीसदी मामलों में कैंसर लिवर तक फैल चुका होता है।

एक बड़ी वजह यह भी बताई गई है कि राज्य में शुरुआती पहचान के लिए आबादी-आधारित (पॉपुलेशन बेस्ड) स्क्रीनिंग की व्यवस्था नहीं है।
किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज?
विशेषज्ञों के अनुसार इन संकेतों के दिखने पर डॉक्टर से जांच जरूर कराएं:
- बिना किसी कारण वजन घटना
- भूख न लगना या उल्टी जैसा महसूस होना
- पेट के ऊपरी हिस्से से पीठ तक जाने वाला दर्द
- आंखों में पीलापन या बिना दर्द के पीलिया
- डायबिटीज या शुगर का नियंत्रण में न आना
ये लक्षण दूसरी बीमारियों में भी हो सकते हैं, इसलिए घबराने के बजाय सही जांच कराना जरूरी है।
जोखिम बढ़ाने वाले कारण
विशेषज्ञों ने इन कारकों को जोखिम से जोड़ा है:
- तंबाकू, गुटखा और शराब का ज्यादा सेवन
- डायबिटीज और मोटापे के मरीजों की बढ़ती संख्या
- फास्ट फूड और आरामतलब जीवनशैली
राजधानी में इलाज की क्या सुविधाएं हैं?
- रीजनल कैंसर सेंटर: एडवांस रेडियोथैरेपी, कीमोथैरेपी और सर्जरी की सुविधा
- निजी कैंसर अस्पताल: पेट स्कैन, लेप्रोस्कोपिक व्हिपल सर्जरी और टारगेटेड थैरेपी
कमी यही है कि शुरुआती स्तर पर जांच के लिए व्यापक स्क्रीनिंग कार्यक्रम नहीं है, जिसके चलते ज्यादातर मरीज स्टेज 3-4 में पहुंचते हैं।
आगे क्या बदलेगा?
संजीवनी कैंसर अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. युसूफ मेमन के मुताबिक, लोग समय पर जांच और इलाज नहीं कराते, इसलिए ज्यादातर मरीज गंभीर अवस्था में आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश में कैंसर को अब नोटिफायबल डिजीज घोषित किया गया है, जिससे हर जिले का अलग डेटा मिल सकेगा। उनका मानना है कि इससे मरीज समय पर इलाज तक पहुंचेंगे और बेहतर नतीजे मिलने में मदद होगी।









