उज्जैन के 11 मंदिरों के कायाकल्प पर टेंपल बांड और 645 करोड़ लोन पर विवाद

उज्जैन के 11 मंदिरों के कायाकल्प के लिए 200 करोड़ के टेंपल बांड और 645 करोड़ के बैंक लोन पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। जानें पूरा मामला।
उज्जैन के 11 प्रमुख मंदिरों के कायाकल्प की योजना पर राजनीति गरमा गई है। उज्जैन विकास प्राधिकरण (UDA) की 1124 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत 200 करोड़ रुपये के टेंपल बांड जारी करने की योजना सामने आई है। विपक्षी नेताओं और कुछ आम लोगों ने इसका विरोध किया है।

विरोध करने वालों का आरोप है कि धर्म की आड़ में मंदिरों का बाजारीकरण किया जा रहा है। नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष डॉ. रवि राय का दावा है कि UDA ने 645 करोड़ रुपये के बैंक लोन की प्रक्रिया भी शुरू की है। इस दावे पर प्रशासन का पक्ष इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
क्या है पूरी योजना
स्रोत के अनुसार योजना की बुनियादी बातें ये हैं:

- UDA शहर के 11 प्रमुख मंदिरों के कायाकल्प पर काम करने की तैयारी में है
- परियोजना की कुल लागत 1124 करोड़ रुपये बताई गई है
- इसके तहत 200 करोड़ रुपये के टेंपल बांड जारी करने की योजना है
क्यों पड़ी पैसों की जरूरत
सिंहस्थ 2028 में आने वाले श्रद्धालुओं को ध्यान में रखकर आधुनिक सुविधाएं, सड़कें और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएं विकसित करनी हैं। इसके लिए UDA को बड़े फंड की जरूरत बताई जा रही है। इसी कारण इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग का मॉडल अपनाया जा रहा है।
विरोध की मुख्य वजह यह है कि इसमें व्यावसायिक आय और दान की रकम को गारंटी के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है।

645 करोड़ के बैंक लोन पर क्या कहा गया
डॉ. रवि राय के अनुसार UDA ने 645 करोड़ रुपये के बैंक लोन की प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें इंडियन ओवरसीज बैंक L-1 (सबसे कम दर वाला) बताया गया है। उन्होंने कुछ सवाल उठाए:
- क्या इतिहास में पहली बार मंदिरों के लिए बैंक लोन लिया जा रहा है?
- क्या किश्तें चुकाने के लिए भविष्य में श्रद्धालुओं पर दर्शन शुल्क या विशेष टैक्स लगाया जाएगा?
- उनका सुझाव है कि सरकार वित्तीय प्रयोग छोड़कर दानदाताओं से सहयोग ले
उन्होंने यह तर्क भी दिया कि जब अयोध्या का राम मंदिर जनता के दान से बन सकता है, तो कालभैरव, मंगलनाथ और सांदीपनि आश्रम जैसे अच्छी आय वाले मंदिरों के लिए बांड की जरूरत क्यों पड़ी।
टेंपल बांड पर भरत पोरवाल के सवाल
पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष भरत पोरवाल ने “मंदिर बचाओ, सनातन बचाओ” का नारा देते हुए कहा कि विकास चाहिए, सौदा नहीं। उन्होंने प्रशासन से ये सवाल पूछे:
- क्या बांड जारी करने से पहले सेबी से अनुमति ली गई है?
- क्या इसके बदले मंदिरों की कीमती जमीनें गिरवी रखी जाएंगी?
- बांड असफल रहा तो जनता का पैसा कौन लौटाएगा?
- बांड धारकों को मंदिर संचालन और चढ़ावे में क्या अधिकार मिलेंगे?
उन्होंने इन बिंदुओं पर प्रशासन से तुरंत श्वेतपत्र जारी करने की मांग की है।
क्या कानूनी रूप से मंदिर बेचा या गिरवी रखा जा सकता है
इस सवाल पर अदालतों के पूर्व फैसलों का हवाला दिया जाता है। इनके मुताबिक:
- मंदिर की संपत्ति का वास्तविक स्वामी स्वयं देवता (भगवान) माने गए हैं
- सरकार या ट्रस्ट मालिक नहीं, सिर्फ देखरेख करने वाला संरक्षक होता है
- कानूनी रूप से मंदिर को न बेचा जा सकता है, न पूरी तरह गिरवी रखा जा सकता है
ध्यान रहे कि यह कानूनी स्थिति का सामान्य विवरण है। UDA ने मंदिरों को गिरवी रखने की बात कही है, इसकी पुष्टि इस सामग्री में नहीं है। विरोधियों के सवाल भी इसी आशंका पर आधारित हैं।
अब आगे क्या
फिलहाल बड़े सवाल अनुत्तरित हैं। बांड की शर्तें क्या होंगी, लोन की गारंटी में क्या रखा जाएगा और चुकौती का स्रोत क्या होगा, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने आनी बाकी है। विपक्ष की श्वेतपत्र की मांग पर UDA या जिला प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार है।









