
बीजापुर के इंद्रावती टाइगर रिजर्व में नागवंश और काकतीय काल की सैकड़ों प्रतिमाओं का सर्वेक्षण नहीं हुआ है। जंगल सफारी से पहले सुरक्षा की जरूरत बताई जा रही है।
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में स्थित इंद्रावती टाइगर रिजर्व के जंगलों में सदियों पुरानी पाषाण प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं। रिपोर्टों के अनुसार ये प्रतिमाएं 11वीं से 13वीं शताब्दी के छिंदक नागवंश और उसके बाद के काकतीय राजवंश के दौर की हैं। अब तक इनका व्यवस्थित सर्वेक्षण, सूचीकरण या फोटो-दस्तावेजीकरण नहीं हो सका है।

चिंता की वजह यह है कि रिजर्व में जंगल सफारी शुरू करने की तैयारी चल रही है। इससे बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ेगी और असुरक्षित पड़ी इन धरोहरों के चोरी या तस्करी की चपेट में आने का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसी कारण संरक्षण की ठोस योजना बनाने की जरूरत बताई जा रही है।
लगभग 2800 वर्ग किमी में फैला है धरोहर का क्षेत्र
इंद्रावती टाइगर रिजर्व बीजापुर जिले में महाराष्ट्र और तेलंगाना की सीमा तक फैला है। इसका क्षेत्रफल करीब 2800 वर्ग किलोमीटर बताया जाता है।

- इस पूरे इलाके में नागवंश और काकतीय काल की सैकड़ों पाषाण प्रतिमाएं मौजूद बताई जाती हैं
- कुछ प्रतिमाएं ऐसी बताई गई हैं जो छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों में देखने को नहीं मिलतीं
- ये मूर्तियां बस्तर के इतिहास, कला और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हैं
अब तक सर्वेक्षण क्यों नहीं हो पाया?
रिजर्व का बड़ा हिस्सा तीन दशक से अधिक समय तक माओवादी प्रभाव में रहा। सुरक्षा चुनौतियों के कारण पुरातत्व विभाग की टीमें नियमित सर्वे और संरक्षण का काम नहीं कर पाईं।
कुछ मौकों पर सर्वेक्षण की योजना बनी, लेकिन सुरक्षा कारणों से टीमें क्षेत्र में नहीं जा सकीं। नतीजा यह कि प्रतिमाओं की वैज्ञानिक जांच, सूचीकरण और फोटोग्राफी तक नहीं हो पाई। यानी आज यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कुल कितनी प्रतिमाएं हैं और कहां-कहां हैं।

जंगल सफारी से क्यों बढ़ सकता है खतरा?
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व में जंगल सफारी की तैयारी की जा रही है। पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा मिल सकता है, लेकिन इलाके में बाहरी लोगों की आवाजाही भी बढ़ेगी।
ऐसे में बिना रिकॉर्ड और बिना निगरानी वाली प्रतिमाओं की चोरी या अवैध हस्तांतरण का जोखिम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। जिस चीज का रिकॉर्ड ही न हो, उसके गायब होने पर पता लगाना भी मुश्किल होता है। इसीलिए सफारी शुरू होने से पहले सुरक्षा इंतजाम को जरूरी बताया जा रहा है।
गांवों से चोरी की खबरें और स्थानीय आस्था
स्थानीय स्तर पर कई गांवों से प्राचीन प्रतिमाओं के चोरी होने की खबरें सामने आती रही हैं। इस बारे में कुछ बातें ध्यान देने लायक हैं:
- कुछ ग्रामीण आस्था के कारण इन मूर्तियों को घरों में रखकर पूजा करते हैं
- कुछ मामलों में बाहरी तस्करों द्वारा सौदे की आशंका जताई गई है, हालांकि यह आशंका के स्तर पर है
- पहचान और मौजूदा स्थिति का रिकॉर्ड न होने से असल स्थिति साफ नहीं है
विशेषज्ञ क्या सुझाव दे रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग और वन विभाग को ग्राम सभाओं के साथ मिलकर कार्ययोजना बनानी चाहिए। सुझाए जा रहे कदम:
- पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण
- हर प्रतिमा का सूचीकरण और फोटो-दस्तावेजीकरण
- सुरक्षित निगरानी की व्यवस्था
- स्थानीय समुदाय को संरक्षण की प्रक्रिया में शामिल करना
आगे क्या होना चाहिए?
माओवादी हिंसा के साये से बाहर निकल रहे बस्तर में अब विकास के साथ विरासत बचाने का सवाल भी सामने है। फिलहाल इस मामले में किसी आधिकारिक संरक्षण योजना या समयसीमा की जानकारी उपलब्ध नहीं है। आधिकारिक पुष्टि और अगले कदमों का इंतजार है।









