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85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ: एक मां का ऐसा संघर्ष जो आपकी आंखों में आंसू ला देगा

कभी भीख मांगकर करती थी गुजारा, अब मानसिक रूप से कमजोर बेटे का पेट भरने के लिए खुद मजदूरी कर रही 85 साल की मनबसिया; युवाओं के लिए बनीं मिसाल।

रामानुजगंज: 85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ: एक मां का ऐसा संघर्ष जो आपकी आंखों में आंसू ला देगा. कहते हैं दुनिया में मां की ममता से बढ़कर कोई ताकत नहीं होती। इस बात को सच कर दिखाया है झारखंड के बरदरी गांव की रहने वाली 85 वर्षीय बुजुर्ग महिला मनबसिया ने। जिस उम्र में शरीर जवाब दे जाता है और लोग बिस्तर का सहारा ले लेते हैं, उस उम्र में यह बुजुर्ग मां अपने 40 वर्षीय बीमार बेटे के लिए पहाड़ जैसा हौसला लिए खड़ी है।

रामानुजगंज और आसपास के इलाकों में मनबसिया का संघर्ष आज हर किसी की जुबां पर है। उनकी कहानी न केवल भावुक करती है, बल्कि जीवन में हार मान चुके लोगों को नई राह भी दिखाती है।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

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झुकी कमर, कांपते हाथ… फिर भी नहीं मानी हार

मनबसिया का शरीर अब उनका साथ नहीं देता। बुढ़ापे के कारण कमर पूरी तरह झुक चुकी है, कदम कांपते हैं और चलने के लिए एक पुरानी लकड़ी ही सहारा है। इसके बावजूद, उनके जज्बे में कोई कमी नहीं आई है।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

वह हर सुबह खेतों और गांव की पगडंडियों पर निकल पड़ती हैं। जंगली करेला, बथुआ साग और अन्य मौसमी सब्जियां तोड़ती हैं। फिर अपनी कमजोर देह पर करीब 8 से 10 किलो वजन का बोझा सिर पर लादकर पैदल बाजार तक पहुंचती हैं। उन्हें इस हालत में सब्जी बेचते देख लोग हैरान रह जाते हैं।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

पागल बेटे के लिए बनीं ‘बुढ़ापे की लाठी’

इस उम्र में आराम छोड़कर इतनी कड़ी मेहनत करने के पीछे एक ही वजह है- ममता। मनबसिया का 40 वर्षीय बेटा शिवपूजन मानसिक रूप से कमजोर है। वह पूरी तरह अपनी 85 साल की मां पर निर्भर है।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

मनबसिया ही उसके लिए खाना बनाती हैं, दवाइयों का इंतजाम करती हैं और दिन-रात एक बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती हैं। बेटे को भूखा न सोना पड़े, इसलिए मां अपनी हर तकलीफ भूलकर काम पर निकल पड़ती है।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

स्वाभिमान की नई कहानी

स्थानीय लोगों के मुताबिक, मनबसिया ने वर्षों तक रामानुजगंज में भीख मांगकर अपना और बेटे का गुजारा किया। लेकिन पिछले 5 वर्षों में जैसे-जैसे उनकी सेहत गिरती गई, उनका स्वाभिमान और मजबूत होता गया। उन्होंने भीख मांगने के बजाय मेहनत की रोटी को चुना। आज वह अपनी मेहनत की कमाई से बेटे का पेट पाल रही हैं।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

युवाओं के लिए एक सबक

मनबसिया की यह कहानी उन युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है जो छोटी-छोटी परेशानियों से घबराकर हार मान लेते हैं। 85 साल की यह मां बिना किसी शिकायत के जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। उनका यह संघर्ष बताता है कि अगर हौसला बुलंद हो, तो शरीर की कमजोरी कभी बाधा नहीं बन सकती।85 की उम्र, झुकी कमर और सिर पर 10 किलो बोझ

Dr. Tarachand Chandrakar

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