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अंबिकापुर के दुग्ध सागर सहकारी समिति में 18 लाख की वित्तीय अनियमितता का मामला।
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कलेक्टर ने 4 महीने पहले ही FIR दर्ज करने का दिया था आदेश।
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पशुपालन विभाग और जिला पंचायत के अधिकारी एक-दूसरे पर लगा रहे देरी का आरोप।
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घोटाले की वजह से समूह की गरीब महिलाओं को बेचने पड़े अपने मवेशी।
अंबिकापुर: अंबिकापुर में 18 लाख का घोटाला: कलेक्टर के आदेश के 4 महीने बाद भी FIR नहीं, अफसर एक-दूसरे पर डाल रहे जिम्मेदारी, सरगुजा जिले में प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां दुग्ध सागर सहकारी सेवा समिति में हुए लगभग 18 लाख रुपये के घोटाले में कलेक्टर के स्पष्ट आदेश के बावजूद 4 महीने बीत जाने पर भी FIR दर्ज नहीं हो सकी है। इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी अब एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं, जबकि घोटाले की मार झेल रहीं गरीब महिलाओं को अपने मवेशी तक बेचने पड़ रहे हैं।

अफसरों का खेल, पीस रहीं गरीब महिलाएं
यह पूरा मामला समिति के तत्कालीन सीईओ दीपक सिंह और शाहिद खान से जुड़ा है। पशुपालन विभाग की जांच में वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने के बाद सरगुजा कलेक्टर ने 29 अप्रैल 2024 को ही पशु चिकित्सा विभाग के उप-संचालक को FIR दर्ज कराने का निर्देश दिया था। लेकिन आज तक यह आदेश फाइलों में ही धूल फांक रहा है।
इस घोटाले का सबसे बुरा असर उन महिलाओं पर पड़ा है जो इस समिति से जुड़ी थीं। दूध के पैसे न मिलने के कारण कई महिलाएं कर्ज में डूब गईं। उन्हें अपने मवेशियों के लिए उधार में चारा खरीदना पड़ा और जब कर्ज चुकाने का कोई रास्ता नहीं दिखा, तो उन्हें अपने मवेशी ही बेचने पड़े। कुछ महिलाओं द्वारा अपनी जमीन बेचकर कर्ज चुकाने की भी खबरें हैं।कलेक्टर के आदेश के 4 महीने बाद भी FIR नहीं, अफसर एक-दूसरे
क्यों अटकी FIR? अधिकारियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप
जब इस देरी का कारण पूछा गया तो अधिकारियों के बीच का आपसी टकराव खुलकर सामने आ गया।कलेक्टर के आदेश के 4 महीने बाद भी FIR नहीं, अफसर एक-दूसरे
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पशु चिकित्सा विभाग का तर्क: उप-संचालक राजेंद्र प्रसाद शुक्ला का कहना है कि FIR के लिए जरूरी मूल दस्तावेज जिला पंचायत के पास हैं। उन्होंने मौखिक रूप से सीईओ से दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्हें अब तक नहीं दिए गए, इसलिए FIR दर्ज नहीं हो सकी।
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जिला पंचायत का जवाब: वहीं, जिला पंचायत सीईओ विनय अग्रवाल ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “पशुपालन विभाग ने हमसे कभी किसी दस्तावेज की मांग ही नहीं की, न लिखित में और न ही मौखिक रूप से। अगर उन्हें दस्तावेज चाहिए तो वे आकर ले जा सकते हैं।”
इस आरोप-प्रत्यारोप से साफ है कि अधिकारी मामले को गंभीरता से लेने के बजाय जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं।कलेक्टर के आदेश के 4 महीने बाद भी FIR नहीं, अफसर एक-दूसरे
कलेक्टर के आदेश की अनदेखी, क्या है नियम?
इस मामले में जिला पंचायत उपाध्यक्ष देवनारायण यादव ने भी नाराजगी जताते हुए इसे जानबूझकर दबाने का आरोप लगाया है। नियम के अनुसार, किसी भी वित्तीय घोटाले की पुष्टि होने पर तत्काल FIR दर्ज कराना अनिवार्य है। आदेश के बावजूद कार्रवाई न करना छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियमावली और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एक गंभीर कदाचार है, जिस पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ निलंबन तक की कार्रवाई हो सकती है। अब सवाल यह उठता है कि क्या कलेक्टर के आदेश की इस तरह अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी?कलेक्टर के आदेश के 4 महीने बाद भी FIR नहीं, अफसर एक-दूसरे









