माँ वनदेवी: सरगुजा का वो दिव्य सिद्धपीठ, जहाँ ‘पत्थर’ चढ़ाने से चमक जाती है भक्तों की किस्मत

माँ वनदेवी:छत्तीसगढ़ का सरगुजा अंचल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। यहाँ की फिजाओं में भक्ति और शक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। माँ महामाया की पावन धरा पर शक्ति के कई रूप पूजे जाते हैं, लेकिन अम्बिकापुर के पास स्थित ‘माँ वनदेवी’ का दरबार अपनी एक बेहद अनोखी परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।
साडबार के घने जंगलों में विराजी हैं ‘स्वयंभू’ माँ वनदेवी
माँ वनदेवी:अम्बिकापुर जिला मुख्यालय से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ग्राम पंचायत हर्रा टिकरा का ‘साडबार’ इलाका। यहाँ के घने और शांत जंगलों के बीच माँ वनदेवी का प्राचीन स्थान है। बताया जाता है कि दशकों पहले माँ यहाँ एक विशाल ‘हाथी स्वरूप’ पत्थर के पास, पीपल के पेड़ के नीचे स्वयंभू रूप में विराजमान थीं।
आज यहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है, लेकिन भक्तों की आस्था आज भी उसी प्राचीन सादगी और प्रकृति से जुड़ी हुई है। प्रकृति की गोद में बसा यह मंदिर आध्यात्मिक शांति चाहने वालों के लिए स्वर्ग के समान है।
अनोखी परंपरा: आखिर क्यों चढ़ाए जाते हैं यहाँ पत्थर?
माँ वनदेवी मंदिर की सबसे दिलचस्प बात यहाँ की सदियों पुरानी पूजा पद्धति है। मान्यता है कि वन में निवास करने वाली देवी को प्रकृति के सरल उपहार ही प्रिय हैं। यहाँ आने वाले भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर या मन्नत मांगते समय मंदिर परिसर में पत्थर (गोटा पत्थर) अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में पत्थरों के विशाल ढेर इस बात का प्रमाण हैं कि माँ के दरबार से आज तक कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से चढ़ाया गया एक छोटा सा पत्थर भी उनकी बड़ी से बड़ी मुश्किल को दूर कर सकता है।
त्रेतायुग से जुड़ा है गहरा नाता: माता सीता का गुप्त वास
माँ वनदेवी:स्थानीय जनश्रुतियों और लोक कथाओं के अनुसार, इस स्थल का संबंध त्रेतायुग से है। कहा जाता है कि वनवास काल के दौरान माता सीता ने इस एकांत और सुरक्षित स्थान पर कुछ समय बिताया था। यहाँ उन्होंने अपनी पहचान गुप्त रखने के लिए ‘वन देवी’ का रूप धारण किया था, तभी से इस स्थान को माँ वनदेवी के नाम से पूजा जाने लगा।
जब राजशाही काल में यहाँ शांत होते थे ‘पागल हाथी’
माँ वनदेवी:सरगुजा रियासत के इतिहास में भी इस मंदिर का विशेष उल्लेख मिलता है। मंदिर के पास स्थित ‘हाथी स्वरूप’ पत्थर के बारे में कहा जाता है कि रियासत काल में जब राजाओं के हाथी अनियंत्रित या पागल हो जाते थे, तो उन्हें इसी पत्थर के समीप लाया जाता था। माँ की दिव्य शक्ति से वे हाथी शांत और स्वस्थ हो जाते थे।
इतना ही नहीं, सरगुजा के राजा जब भी शिकार पर निकलते थे, तो वे माँ वनदेवी का आशीर्वाद लेना और अनुमति मांगना अनिवार्य समझते थे। यह परंपरा आज भी इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।
आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र बनता साडबार
आज साडबार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जागृत सिद्धपीठ और पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। मुख्य मंदिर के साथ-साथ अब यहाँ:
वनेश्वर महादेव
विनायक (गणेश) मंदिर
पंचमुखी हनुमान
राधा-कृष्ण और संतोषी माता के मंदिर भी स्थापित हैं।
माँ वनदेवी:प्रकृति, इतिहास और अटूट श्रद्धा का यह संगम हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है। अगर आप भी मानसिक शांति और दैवीय कृपा की तलाश में हैं, तो माँ वनदेवी का यह दरबार आपके लिए एक उत्तम गंतव्य है।



















