अदालती वीडियो पर बैन: RTI कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांगे स्पष्ट नियम

सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाइयों के वीडियो अब सोशल मीडिया पर शेयर नहीं किए जा सकते। इस रोक को लेकर अब RTI कार्यकर्ता अदालत पहुंच गए हैं। उनका कहना है कि पूरी तरह बैन लगाने की बजाय सही और पारदर्शी नियम बनाए जाने चाहिए।
मामला क्या है?
हम बिना पूर्व अनुमति के अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अपलोड और शेयर करने पर रोक लगा रहे हैं।
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— Dr. Sheetal yadav (@Sheetal2242) July 24, 2026
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- 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश दिया था
- यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने दिया
- आदेश के तहत बिना अनुमति अदालती वीडियो शेयर करना, रील बनाना और उससे कमाई करना बैन कर दिया गया
- कोर्ट को डर है कि इससे न्यायपालिका की छवि खराब हो सकती है और गलत मीम्स फैल सकते हैं
RTI कार्यकर्ताओं की मांग क्या है?
RTI activists Anjali Bhardwaj and Amrita Johri moves Supreme Court to intervene in the plea on live streaming of court proceedings and regulation of judicial audio-video recordings
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— Bar and Bench (@barandbench) July 31, 2026
आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी ने वकील प्रशांत भूषण के जरिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की है। उनका कहना है:
- समस्या असली है, पर हल गलत है — फर्जी और भ्रामक वीडियो एक सच्ची समस्या है, लेकिन पूरी तरह बैन लगाना सही जवाब नहीं
- यह मौलिक अधिकार का मामला है — संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत खुली अदालत देखना नागरिकों का हक है
- ईमानदार और बदनीयत में फर्क नहीं किया गया — सही जानकारी देने वाले पत्रकारों और जानबूझकर गुमराह करने वालों को एक जैसा माना गया है
- परमिशन का झंझट — हर क्लिप के लिए पहले अनुमति लेना अधिकार को मुश्किल बना देता है
- किसे छूट, किसे नहीं — “मान्यता प्राप्त मीडिया” को छूट है, पर डिजिटल और सिटीजन जर्नलिस्ट के लिए कोई साफ नियम नहीं है
कार्यकर्ताओं का असली सुझाव क्या है?
कार्यकर्ताओं ने कोर्ट से कहा कि नकली क्लिप्स रोकने का सबसे अच्छा तरीका है:
- एक भरोसेमंद और सरकारी डिजिटल आर्काइव बनाना
- जिससे लोग पूरा असली वीडियो कभी भी देख सकें
- ऐसा होने पर फर्जी क्लिप अपने आप पकड़ी जाएगी
पहले के फैसलों का हवाला
अर्जी में कोर्ट के अपने ही दो पुराने फैसलों का जिक्र किया गया है:
- स्वप्निल त्रिपाठी केस (2018) — कोर्ट ने कहा था कि लाइव स्ट्रीमिंग जनता का हक है
- चुनाव आयोग बनाम एम.आर. विजयभास्कर (2021) — कोर्ट ने कहा था कि डिजिटल मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता
आगे क्या होगा?
- एक तरफ AI और रील्स के दौर में गलत जानकारी तेजी से फैल रही है
- दूसरी तरफ पारदर्शी न्याय व्यवस्था बनाए रखना भी जरूरी है
- कार्यकर्ताओं ने कोर्ट से एक संतुलित नियम बनाने की मांग की है — जिससे गलत कंटेंट पर सख्ती हो, पर आम नागरिकों का जानकारी पाने का हक भी सुरक्षित रहे












