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मणिपुर हिंसा : भारत की मणि टूट रही

VM News desk Delhi :-

– योगेन्द्र यादव

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मणिपुर हिंसा : भारत की मणि टूट रही

परिवार के मुखिया की पहली जिम्मेदारी होती है अपने परिवार को जोड़े रखना। पड़ोसी से निपटने और मोहल्ले में डंका बजाने की बारी बाद में आती है। इसी तरह देश के नेतृत्व की पहली जिम्मेदारी है कि वह देश के सभी इलाकों, वर्गों और समुदायों में एकता बनाए रखे, वैमनस्य पैदा ही न होने दे, आपसी तनाव या झगड़े का पहला संकेत मिलते ही उसे सुलझाए। टी.वी. स्टूडियो में बैठकर पड़ोसी देश पर हवाई तलवार भांजना राष्ट्रवाद की निशानी नहीं है। सच्चा राष्ट्रवादी वह है जो चुपचाप राष्ट्रीय एकता में पड़ी हर दरार को भरे, हर विवाद में न्याय और सुलह सफाई करे, देश को अंदर से मजबूत करे। जो राष्ट्र रूपी घर में लगी आग को देखकर आंख मूंद ले या उसमें पैट्रोल छिड़क दे, वो और कुछ भी हो राष्ट्रवादी नहीं हो सकता।

इन दिनों मणिपुर भारतीय राष्ट्रवाद की परीक्षा ले रहा है। भारत की यह मणि टूट रही है। भारत मां के 120 बच्चे उसकी गोद में हमेशा के लिए सो चुके हैं। कोई 45,000 बेघर हो चुके हैं। 2 महीने से ऊपर हो चुके, लेकिन खून के छींटे बंद नहीं हुए हैं। एक-दूसरे के खून के प्यासे समुदाय सरकारी हथियारखाने को लूटकर सड़क पर ऑटोमैटिक राइफल लेकर घूम रहे हैं। ड्रोन से एक-दूसरे के ठिकाने तलाश रहे हैं, हमला कर रहे हैं। पुलिस ही नहीं फौज भी बेबस है। लेकिन पूर्वोत्तर की त्रासदी से देश बेखबर है। उम्मीद फाजली के शब्दों में ‘अगर कयामत ये नहीं है तो कयामत क्या है शहर जलता रहा और लोग न घर से निकले।’

देश भले ही इस सच्चाई से बेखबर हो, लेकिन यह प्रधानमंत्री से तो छुपी नहीं रह सकती। लेकिन पिछले 2 महीने से नरेंद्र मोदी ने मणिपुर की स्थिति पर एक शब्द भी नहीं बोला है। न एक अपील शांति की। न दो शब्द सांत्वना के। न कोई राष्ट्र के नाम संबोधन। न ही मन की बात में मणिपुर की कोई बात। न मणिपुर का दर्द सुनाने आए प्रतिनिधिमंडल से 2 मिनट बात करने की फुर्सत। न अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री और इस समस्या की जड़ बीरेन सिंह को हटाने का कोई संकेत। न दो महीने से इस फसाद को सुलझाने में नाकाम देश के गृहमंत्री को कोई संदेश और न ही इस अराजकता को रोकने की केंद्र सरकार को संवैधानिक जिम्मेदारी का अहसास। अगर आप या मैं आज मणिपुर के निवासी होते तो जरूर ढूंढ रहे होते कि देश के प्रधानमंत्री कहां हैं? या क्षुब्ध क्षणों में पूछ रहे होते कि क्या यह मेरा देश है?

राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रधानमंत्री की लापरवाही का यह पहला नमूना नहीं है। पिछले 9 साल में जब-जब देश के किसी भी हिस्से में ऐसी कोई चुनौती आई है, प्रधानमंत्री ने देश के मुखिया होने की जिम्मेदारी का निर्वाह करने की बजाय चुप्पी से काम लिया है। प्रधानमंत्री ने पंजाब और हरियाणा के बीच जल विवाद को सुलझाने की कोई कोशिश नहीं की है। अपने आप को राष्ट्रवादी घोषित करने वाली उनकी पार्टी हरियाणा में जनता की भावनाएं भड़काने का काम करती है तो उधर पंजाब विधानसभा में बैठे उसके विधायक पंजाब की जनता को रिझाने के लिए ठीक उलट बयान देते हैं। प्रधानमंत्री ने न तो दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बैठा कर इस मामले को सुलझाने की कोशिश की और न ही अपनी पार्टी को 2-4 वोट का लालच छोड़कर राष्ट्रीय हित में काम करने की नसीहत दी।

ठीक यही राजनीतिक खेल कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद के बारे में खेला जा रहा है। प्रधानमंत्री को तमिलनाडु के सेंगोल को राष्ट्रीय प्रतीक बनाने में दिलचस्पी है, लेकिन तमिलनाडु के किसानों को पर्याप्त पानी दिलाने के लिए कर्नाटक के अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री से बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जब हरियाणा में जातीय हिंसा हुई, प्रदेश के अनेक शहर जले, सरकार गुम हो गई, तब भी प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोले। उनकी पार्टी के नेता इस हिंसा के नफे-नुक्सान को वोट के तराजू में तौलते रहे। हां, अगर घर में लगी आग पर रोटी सेंकने का मौका हो तो नरेंद्र मोदी उसे चूकते नहीं हैं। सवाल है कि यह कैसा राष्ट्रवाद है जो राष्ट्र की टूटन के प्रति इतना लापरवाह है?

इस संदर्भ में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल को याद करना प्रासंगिक होगा। जब राजीव गांधी 1985 में प्रधानमंत्री बने तो उनकी आयु, उनकी राजनीतिक समझ और अनुभव नरेंद्र मोदी के मुकाबले में कुछ भी नहीं था। उनकी पार्टी पर सिख विरोधी नरसंहार का दाग भी था। लेकिन उस नौसिखिए प्रधानमंत्री ने भी पंजाब में संत लौंगोवाल के साथ समझौता किया। असम में 7 वर्ष से चल रहे आंदोलन को समाप्त किया, अपनी पार्टी की चुनावी हार को स्वीकार किया। मिजोरम में तो उन्होंने अपनी पार्टी की सरकार को हटाकर विद्रोही लालडेंगा को मुख्यमंत्री नियुक्त किया और उस सीमांत राज्य में दीर्घकालिक शांति का मार्ग प्रशस्त किया।

अपनी तुलना जवाहरलाल नेहरू से करने को उत्सुक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शायद यह तुलना पसंद न आए लेकिन राष्ट्रीय एकता के लिए राजनीतिक जोखिम उठाकर ईमानदारी से प्रयास करने के मामले में फिलहाल वे राजीव गांधी से भी काफी पीछे हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वह अब स्वदेश वापस आकर देश के मुखिया होने के नाते अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने की शुरूआत मणिपुर से करेंगे।

 

Nidar Chhattisgarh Desk

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