गौरेला-पेंड्रा-मरवाही DMF: बिना अनुमोदन 160 कार्य स्वीकृत, 63 निरस्त

GPM में DMF के 160 कार्यों की ₹17.47 करोड़ की स्वीकृति बिना समिति अनुमोदन के हुई, ₹8.32 करोड़ के चेक जारी हुए। कलेक्टर ने 63 कार्य निरस्त किए।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले में जिला खनिज न्यास (DMF) की राशि से 160 कार्यों को दी गई प्रशासकीय स्वीकृति अब प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गई है। 21 अक्टूबर 2026 के कलेक्टर कार्यालय के पत्र के अनुसार, करीब ₹17.47 करोड़ के इन कार्यों को प्रबंधकारिणी समिति और शासी परिषद के अनुमोदन के बिना स्वीकृत किया गया था।

इन कार्यों के लिए ₹8.32 करोड़ की पहली किस्त के चेक भी जारी हो चुके थे। वर्तमान कलेक्टर विजय दयाराम के. ने 29 अक्टूबर 2026 को जारी आदेशों में अनुमोदन के बिना स्वीकृत 63 कार्यों को निरस्त कर दिया है। यह घटनाक्रम तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी के तबादले के आसपास का बताया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार मामले की मुख्य बातें:

- DMF के तहत 160 कार्यों को प्रशासकीय स्वीकृति दी गई
- कुल स्वीकृत राशि लगभग ₹17.47 करोड़
- पहली किस्त के रूप में ₹8.32 करोड़ के चेक जारी हुए
- 21 अक्टूबर 2026 के पत्र में प्रबंधकारिणी समिति और शासी परिषद का अनुमोदन न लिए जाने का उल्लेख है
- पत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए तय 70:30 के अनुपात का पालन न होने की बात भी सामने आई है
29 अक्टूबर के आदेश में क्या हुआ?
वर्तमान कलेक्टर की कार्रवाई में बिना अनुमोदन स्वीकृत 63 कार्य निरस्त किए गए। इनका ब्लॉकवार ब्योरा यह है:
- गौरेला जनपद: 37 कार्य
- मरवाही जनपद: 21 कार्य
- पेंड्रा जनपद: 5 कार्य
जिन कार्यों के लिए राशि पहले ही जारी हो चुकी थी, उसे DMF खाते में वापस जमा कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।

70:30 के अनुपात का मामला क्या है?
DMF की राशि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए होती है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावित क्षेत्रों के बीच खर्च का अनुपात 70:30 तय है। कलेक्टर कार्यालय के पत्र में इस अनुपात का पालन न होने का उल्लेख है। कार्यों का चयन किन आधारों पर हुआ और क्या वास्तविक प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों को प्राथमिकता मिली, यह जांच का विषय बताया जा रहा है।
कमीशन के आरोप: क्या पुष्ट है और क्या नहीं?
स्थानीय स्तर पर कथित 15 प्रतिशत कमीशन की चर्चा है। आरोपों के मुताबिक इसमें 10 प्रतिशत तत्कालीन कलेक्टर, 3 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर और 2 प्रतिशत DMF शाखा के बाबू के नाम पर बताए जा रहे हैं। इसी तरह कुछ कार्यों में लगभग ₹2 लाख की लागत पर ₹12 लाख का चेक जारी होने का आरोप भी उठा है।
ये दोनों बातें अभी आरोप और चर्चा के स्तर पर हैं। इनके समर्थन में कोई दस्तावेजी प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुआ है और स्वतंत्र जांच से इनकी पुष्टि बाकी है। तत्कालीन कलेक्टर को किसी रिश्वत या आर्थिक लाभ मिलने का भी कोई प्रमाण अब तक सामने नहीं आया है।
अब कौन-से सवाल जांच के केंद्र में हैं?
मामले में प्रशासनिक स्तर पर ये सवाल उठ रहे हैं:
- ₹17.47 करोड़ की स्वीकृति किस अधिकारी के आदेश से जारी हुई?
- फाइल का परीक्षण और तकनीकी स्वीकृति किसने दी?
- ₹8.32 करोड़ के चेक किसके हस्ताक्षर से और किस स्तर की अनुमति पर जारी हुए?
- निरस्त कार्यों के लिए जारी राशि की कितनी वसूली हुई?
- शेष 97 कार्यों की स्थिति क्या है और क्या उनकी भी जांच होगी?
- जिन कार्यों का भुगतान हो चुका है, उनकी मौके पर स्थिति कौन सत्यापित करेगा?
आगे क्या होगा?
63 कार्य निरस्त होने के बाद शेष 97 कार्यों का भविष्य अभी साफ नहीं है। इनकी स्वीकृति प्रक्रिया की जांच होगी या नहीं, इस पर आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। वसूली की प्रगति और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई पर भी फिलहाल कोई स्पष्टता नहीं है। स्वतंत्र वित्तीय और तकनीकी जांच, बैंक लेनदेन की पड़ताल और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा से ही तस्वीर साफ होगी।









